बाल
स्वास्थ्य
और
जनसंख्या
बचपन
की
भिन्न-भिन्न
अवस्थाओं
के
दौरान
विभिन्न
कारणों
से
बच्चों
की असमय
में ही
मृत्यु
हो जाती
है।
जन्म के
समय का
वजन कम
होने,
चोट लग
जाने,
सेप्सिस
या
संक्रमण
होने
जैसी
गर्भावस्था
से
संबंधित
जटिलताओं
और
जैविकी
से
संबंधित
कारणों
से जन्म
से 28 दिन
के भीतर
64
प्रतिशत
नवजात
शिशु
मौत के
मुंह
में चले
जाते
हैं।
अपने
जन्म से
प्रथम
या
शेशवावस्था
के
दौरान
मृत्यु
होने के
प्रमुख
कारण
हैं-जन्म
के समय
शिशु का
वजन कम
होना,
कुपोषण,
अतिसार (डायरिया)
और
श्वांस
नली में
संक्रमण
होना।
इस
प्रकार,
बाल
मृत्युदर
लोगों
के जीवन
के स्तर
का
प्रभावी
सूचक है
क्योंकि
माता-पिता
के जीवन
स्तर और
उनके
विकास
के अवसर
उनके
बच्चों
के
जीवित
रहने की
संभावनाओं
में
स्पष्ट
रुप से
झलकते
हैं। यह
स्थिति
केवल
स्वास्थ्य
प्रणाली
की
असफलता
पर ही
प्रकाश
नहीं
डालती
बल्कि
सामाजिक
विकास
के
कार्यक्रम
पर भी
समग्र
रुप से
ध्यान
आकर्षित
करती
है।
जनसंख्या
कार्यक्रम
बाल
मृत्युदर
पर
ध्यान
केन्द्रित
करता है
क्योंकि
उनका
लक्ष्य
उस स्तर
को
प्राप्त
करना है
जहां
सामाजिक
आर्थिक
विकास
के उच्च
स्तर पर
उच्च
वर्गों
के साथ
निम्न
मृत्युदर
एवं
निम्न
जन्म दर
के जरिए
जनसंख्या
स्थिर
हो जाती
है। बाल-मृत्युदर
से केवल
मृत्युदर
ही अधिक
नहीं
होती
बल्कि
इससे
जन्म दर
भी बढ़
जाती है
क्योंकि
माता-पिता
और अधिक
बच्चे
पैदा
करना
चाहते
हैं
ताकि
मृतक
बच्चे
की
पूर्ति
की जा
सके,
इससे
माताओं
को कई
बच्चों
को जन्म
देना
पड़ता
है,
जिनके
जीवित
रहने की
संभावना
बहुत
क्षीण
होती
है।
भारत
वर्ष
में
इतने
बच्चे
कम वजन
वाले
क्यों
पैदा
होते
हैं?
यदि
कोई
बच्चा 2.5
कि. ग्रा.
स कम वचन
का पैदा
होता है
तो उसे
कम वचन
वाला
वाला
बच्चा
माना
जाता
है।
भारत
वर्ष
में
लगभग 70
प्रतिशत
बच्चों
का वजन
उनके
जन्म के
समय
किया ही
नही
जाता।
बच्चे
का
पोषणिक
भविष्य,
किशोर
और
गर्भावस्था
में
उसकी
मां के
पोषणिक
स्तर से
प्रारम्भ
होता
है। मां
का
स्वास्थ्य
और पोषण
अच्छा न
होने
तथा
भ्रूण
का उचित
विकास न
होने का
कारण कम
वजन
वाले
बच्चे
पैदा
होते
हैं।
ऐसे
शिशु
संक्रमण,
कमजोर
प्रतिरक्षा
तंत्र,
स्मरण
शक्ति
की
अशक्तता,
क्षीण
शारीरिक
विकास
से
पीड़ित
रहते
हैं और
बहुत से
बच्चे
जन्म के
तुरंत
बाद ही
मौत के
मुंह
में चले
जाते
हैं।
यदि
किसी
महिला
को उसकी
युवा
अवस्था
से ही
पालन
पोषण
उचित
प्रकार
से न हो
रहा हो
तो ऐसी
माताएं
कम वजन
वाले
बच्चे
को ही
जन्म
देती
हैं और
यह चक्र
निरंतर
चलता
रहता
है।
अपर्याप्त
भोजन या
आराम,
धूम्रपान,
संक्रमण
या ऐसी
सांस्कृति
प्रथाएं
जो
गर्भावस्था
में
अच्छी
खुराक
लेने पर
प्रतिबंध
लगाती
है ताकि
महिलाओं
का वजन
अधिक न
हो जाए
और कई
घंटों
तक
शारीरिक
श्रम
करते
रहने से
कम वजन
वाले
बच्चों
के पैदा
होने की
संभावना
बढ़
जाती
है।
गर्भ
धारण
करने
में
अंतराल
का होना
और बार-2
गर्भ
धारण
करना भी
इसमें
बहुत
महत्व
रखता है,
इससे
काफी
जोखिम
बढ़
जाता है
जैसा कि
कहा गया
हैः-
तरूणाई
में
बुढ़ापे
में,
अनेक या
बिल्कुल
बच्चा
पैदा न
करना
जोखिम
पूर्ण
है।
विटामिन
ए,
आयोडिन
फोलेट,
जिंक
जैसे
अन्य
पोषक
तत्व
प्रयाप्त
मात्रा
में न
लेने से
मां और
भ्रूण
दोनों
पर होने
वाले
बच्चे
पर गहरा
प्रभाव
पड़ता
है।
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