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गर्भ निरोध और जनसंख्या

गर्भ निरोध क्या है?
विभिन्न साधनों में से किसी भी एक साधन के जरिए गर्भधारण करने को जानबूझ कर रोकना ही गर्भनिरोध कहलाता है। सामान्यतः जन्म-नियंत्रण या गर्भनिरोध वह है जो किसी महिला को गर्भवती होने से रोकता है। गर्भनिरोध का सबसे स्वरूप संयम बरतना है। तथापि, कामवासना से अलग रहने से ही स्वाभाविक मानवीय काम प्रेरणा पर विजय प्राप्त की जा सकती है। चिकित्सा पद्धति के अनुसार विभिन्न साधनों के जरिए गर्भ निरोध किया जा सकता है जो अस्थायी या स्थायी हो सकता है ताकि जो लोग संयम नहीं बरत सकते वे गर्भधारण करने पर नियंत्रण पा सकते हैं।

कितने और कितने अंतराल पर बच्चे पैदा हो यह स्वतंत्र और विश्वसनीय रूप से निश्चित करने तथा ऐसा करने से संबंधित सूचना शिक्षा और साधनों की जानकारी प्राप्त करने के अधिकार को जनन अधिकार का महत्वपूर्ण घटक माना जाता है गर्भनिरोधकों से पुरूष और महिलाएं इन अधिकारों का प्रयोग कर सकती हैं।

भारत वर्ष में "मिश्रित विधि" के गर्भनिरोधक प्रयोग की पद्धति क्या है?
आधुनिक चिकित्सा शास्त्र ने हमारे समक्ष गर्भनिरोधक के कई विकल्प प्रस्तुत किए हैं। गर्भ रोकने के विभिन्न विधियों के प्रयोगों की वितरण पद्धति को "मिश्रित विध" कहा जाता है भारत एक मात्र ऐसा देश है जहां महिलाओं का बन्ध्यीकरण नलबन्दी करना एक प्रमुख विधि मानी जाती है जिसे अधिकांश दंपती अपने परिवार का वांछित आकार रखने के लिए इस विधि को पसंद कर रहे हैं तथा स्थायी विधि के रूप में इसे अपना रहे हैं।

हम अपने जनसंचार अभियानों के बावजूद भी लोगों के गर्भनिरोधक व्यवहार में परिवर्तन लाने में सफल क्यों नहीं हुए?
जनसंचार अभियान उत्पाद दिखाने, सूचना देने, रूचि पैदा करने और जनता की राय को प्रभावित करने का सामर्थ्य रखते हैं। वे लोगों को दुकान तक ले जा सकते हैं लेकिन वे उत्पाद खरीदने के लिए उन्हें मजबूर नहीं कर सकते। उत्पाद की अन्तर्निहित गुणवत्ता, विक्रयकला, उत्पाद प्रयोग करने के लिए प्रलोभन और विक्रय के बाद सेवाएं उपलब्ध कराना आदि ऐसे तत्व हैं जो अन्ततः उत्पाद खरीदने और सफलतापूर्वक उनका प्रयोग करने के निर्णय को प्रभावित करते हैं।

प्रायः जब गर्भनिरोधक के प्रयोग करने की बाद आती है तो इन मूलभूत तत्वों की उपेक्षा कर दी जाती है तथा उच्च स्तर के संचार कौशल की मांग की जाती है क्योंकि इस स्तर पर व्यक्तिगत रूप से संपर्क रखा जाता है और विकल्पों के बारे में सूचना उपलब्ध कराई जाती है। 1960 और 1970 के दशक के अत्यंत सफल जन संचार अभियानों ने गर्भनिरोधक के बारे प्राप्त विश्व का ज्ञान भारत में उपलब्ध कराया। तथापि, वे अभियान उस सूचना को कार्यरूप में बदलने में असफल रहे क्योंकि सेवाएं उपलब्ध कराने में स्वास्थ्य प्रणाली लड़खड़ा गई।

परिवर्तन प्रक्रिया के भिन्न-2 चरणों में लोग भिन्न-2 प्रकार के संचार की मांग करते हैं। परिवर्तन प्रक्रिया के विभिन्न चरणों (समझना, प्रयोग करना, अपनाना और समर्थन करना) में परामर्श देने, सेवा उपलब्ध कराने अनुवर्ती सेवा और अवसर सृजित करने की मांग की जाती है ताकि इन विधियों को अपनाया जा सके। ऐसी क्रमबद्ध संचार नीति को व्यवहार परिवर्तन संचार भी कहा जाता है जो एक दशक पूर्व तक उपलब्ध नहीं थी या प्रचालन में नहीं था।

भारत में अंतराल-विधि का प्रयोग इतना मंद क्यों हैं?
अंतराल विधि के कम (मंद) प्रचलन के निम्नलिखित कारण हैं-

  1. इन विधियों की जानकारी का अभाव/उन तक पहुंच का अभाव।
  2. परामर्श देने और अनुवर्ती सेवाओं का स्तर बेहतर न होना।
  3. महिला के स्वास्थ्य की स्थिति अच्छी न होने जैसे कि अरक्तता, जननली में संक्रमण और यौन संचारित बीमारियों के होने के कारण उत्पन्न जटिलताओं से संबंधित विधि का प्रभाव।
  4. मां और बच्चे के स्वास्थ्य के साथ गर्भनिरोधक सेवाओं का सामंजस्य स्थापित करने के कारण कण्डोम का प्रयोग करना कठिन हो जाता है क्योंकि इस कार्य में पुरूष को शामिल किया जाना अपेक्षित है। तथापि, एच.आई. वी/एड्स के खतरे को देखते हुए दोहरी संरक्षण विधि के रूप में कण्डोम के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
  5. दंपत्ती थोड़े समय में ही वांछित बच्चे पैदा करके नसबंदी/नलबंदी करा लेते हैं, जिससे अंतराल विधि की उनकी आवश्यकता कम हो जाती है।
  6. परिवार कल्याण कार्यक्रम के अंतर्गत बन्ध्यीकरण पर अधिक ध्यान केन्द्रित करने से अंतराल विधियों को अपनाने के अवसर कम हो जाते हैं।
  7. प्रतिवर्ती विधियों का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित विशेषतः उव युवतियों (15-30 वर्ष) को प्रोत्साहित करने में भारत का परिवार नियोजनः कार्यक्रम पूर्णतः असफल हो चुका है जो अपनी जनन अवधि के दौरान उन वर्षों में सबसे अधिक जननक्षमतारखती है।  आज छोट परिवार के बारे में संचार अभियान चलाना आसान हो चुका है, बन्ध्यीकरण को अधिक वरीयता दिए जाने के कारण दो बच्चों के बीच पर्याप्त अंतर रखने की विधि सफल नहीं हुई।

जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए बच्चों के जन्म के बीच पर्याप्त अंतर रखना महत्वपूर्ण क्यों है?
बच्चे कितने हैं, इस तथ्य को ध्यान में रखे बिना, बच्चों के जन्म में अंतराल रखने का जनसंख्या स्थिरीकरण पर स्वतंत्र प्रभाव पड़ता है। दो क्रमिक गर्भों के बीच अंतराल या अंतर जनसंख्या वृद्धि के संवेग को कम करने में स्वभावतः सहायता करेगा क्योंकि जो बच्चे देर से पैदा होते हैं वे जनन स्तर पर भी देर से पहुंचते हैं।

अंतराल से मां और बच्चे का स्वस्थ रहना सुनिश्चित है जिससे बच्चे के जीवित रहने के अवसर बढ़ जाते हैं और इस प्रकार बड़े परिवार की इच्छा समाप्त हो जाती है।

दो गर्भों के बीच अंतराल रखना केवल जन्म को कम करने के लिए महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि जनसंख्या के जीवन को सुधारने के लिए भी महत्वपूर्ण है। पर्याप्त अंतराल रखने और कम बच्चों को जन्म देने से केवल मां और बच्चे का स्वास्थ्य ही बेहतर नहीं होता बल्कि पुरूषों और महिलाओं को उपलब्ध विकास के अवसरों में भी सुधार होता है चाहे वे अवसर शिक्षा, रोजगार या सामाजिक सांस्कृति सहभागिता से संबंधित हो। इनसे वांछित जनन क्षमता अर्थात बच्चों की उस संख्या में कमी आ जाती है जो एक दंपत्ती अपने परिवार में रखना चाहते हैं।

अतः परिवार नियोजन की अस्थायी विधियों के माध्यम से दो गर्भों के बीच पर्याप्त अंतराल रखने को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों और कार्यक्रमों को विस्तृत रूप से प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है।

अंतराल विधियों को किस प्रकार से प्रोत्साहित किया जा सकता है?
अंतराल विधियों के प्रयोग को बढ़ावा देने की कुंजी एक तरफ तो संचार साधनों को बढ़ाना है और दूसरी तरफ दक्ष सेवाएं उपलब्ध कराना है। संचार के महत्व का पता इस तथ्य से लगता है कि विवाहित महिलाओं में से 99 प्रतिशत महिलाएं कम से कम एक आधुनिक गर्भनिरोधक विधि से परिचित हैं। तथापि, सभी विधियों को जानकर जो कि ज्ञात विकल्प के लिए पूर्वापेक्षित हैं, केवल 58 प्रतिशत महिलाओं को है और केवल 42 प्रतिशत किसी एक आधुनिक विधि का प्रयोग करती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि परामर्श देने और व्यक्तिगत रूप से सूचना देने के कार्य को स्वास्थ्य कर्मचारियों द्वारा अपनी सेवा का अनिवार्य भाग के रूप में नहीं माना जाता जबकि ऐसा करना ज्ञात विकल्प के लिए अत्यंत अनिवार्य है।

संचार व्यवस्था और परामर्श सेवाएं उन मनगढंत कथाओं और गलत अवधारणाओं पर प्रकाश डालने के लिए अनिवार्य हैं जो विधि से संबंधित समस्याओं को और गहरा बना देती है जिनके कारण लोग गर्भनिरोधक का प्रयोग करना अनिवार्यतः बंद कर देते हैं। महिलाओं का अधिक सम्मान किए जाने और उन्हें विभिन्न विधियों तथा संबंधित पार्श्वप्रभावों के बारे में बता कर सशक्त बनाए जाने के आवश्यकता है ताकि ज्ञात विकल्प का चयन कर सके। अनुवर्ती देखरेख, विशेषतः जटिलताओं से संबंधित विधि के मामले में भी निर्णायक है।

इसके साथ-2, अच्छी गुणवत्ता वाले गर्भनिरोधकों की उपलब्धता में सुधार लाना भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके अभाव में कोई संचार संबंधी प्रयास सफल नहीं हो सकते। विभिन्न कार्यक्रमोम के अंतर्गत स्थानीय कार्यकर्ताओं एवं समुदाय आधारित सेवा प्रबंधकों के माध्यम से सामाजिक फ्रेचाइज और कार्पोरेट के माध्यम से सामाजिक विपणन का देश में परीक्षण किया जा रहा है।

कुछ दंपत्ती पुरूष बन्ध्यीकरण का विकल्प क्यों चुनते हैं?
काफी समय से भारत में जनसंख्या कार्यक्रम महिला केन्द्रित हो चुका है। अब वे दिन विदा हो चुके हैं जब नसबंदी या पुरूष बन्ध्यीकरण को एक विधि माना जाता था। गर्भनिरोध की स्थायी विधि अपनाने का विकल्प

चुनने वाले दंपत्तियों में से 67.3 प्रतिशत ने 1963 में नसबंदी कराने का विकल्प चुना। यह विकल्प 1976 - 1977 के दौरान 77 प्रतिशत तक पहुंच गया लेकिन इसमें बहुत तेजी से गिरावट आई और 1980 - 1981 में 21.4 प्रतिशत, 1990 - 1991 में 6.2 प्रतिशत और 2000 - 01 में 2.3 प्रतिशत लोगों नें ही नसबंदी कराई।

इस गिरावट का प्रत्यक्ष कारण ज्यादतियों का होना था, जबकि लक्ष्य पूरा करने के लिए बिना सोचे समझे जबरदस्ती नसबंदी कराई गई। महिला बन्ध्यीकरण में लोपरोस्कोपिक तकनीकों के विकास एवं प्रोत्साहन ने इसे महिलाओं के लिए बहुत आसान बना दिया है।

यद्यपि नसबंदी भी समान रूप से आसान है परन्तु फिर भी विभिन्न मनगढंत कथाओं और गलत धारणाओं के कारण इस विधि को वरीयता नहीं दी जा रही है। कामवासना और ताकत समाप्त हो जाने का भय, नसबन्दी का सफल न होना और जन्म पर नियंत्रण करना महिलाओं का उत्तरदायित्व मानना। इस प्रवृति के कारण इस विधि को बहुत कम लोगों द्वारा स्वीकार किया गया है। पुरूष बन्ध्यीकरण सेवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के स्तर पर एवं नियमित आधार पर अपलब्ध करा कर तथा उन तक पहुंचाने के साधनों में वृद्धि करने के अलावा, जन संचार अभियानों के जरिए क्षेत्रीय स्तर पर और वृहत स्तर पर कार्यक्रम को एक सुदृढ़ संचार सहायता की आवश्यकता है।

यदि लोग अन्य विधियों की अपेक्षा किसी विधि विशेष को पसंद करते हैं तो उस विधि को बड़े स्तर पर प्रोत्साहित करने में क्या दोष है?
दंपत्तियों की गर्भनिरोधक आवश्यकताएं, उनकेजीवन की स्थिति पर निर्भर भिन्न-भिन्न होती हैं। उदाहरणार्थ- नव विवाहित दंपत्ति को अंतराल विधि की आवश्यकता हो सकती है। जबकि अपे परिवार का आकार पूरा कर चुके दंपत्ति को स्थायी विधि अपनाने की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार स्तनपान कराने वाली मां की आवश्यकताएं उस महिला से भिन्न होंगी जो कभी-कभी संभोग करती हैं। तार्किक दृष्टि से किसी भी विधि विशेष को बड़े स्तर पर अपनाना लोगों के लिए संभव नहीं है। आदर्शतः विभिन्न आयु वर्ग की और भिन्न पारिवारिक परिस्थितियों वाली महिलाओं और पुरूषों को उपलब्ध विभिन्न प्रकार की विधियों में किसी भी विधि को चुनने और उसे अपनाने का विकल्प प्राप्त होना चाहिए।

किन्तु यदि सब विधियों में से किसी एक विधि को वरीयता दी जाती है तो यह अन्य विधियों के बारे अपर्याप्त सूचना और जानकारी होने, सेवा केन्द्रों तक सीमित पहुंच, लागत घटक या मनगढंत बातों और गलत धारणाओं के कारण होता है।

प्रायः यह कार्यक्रम के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संबंधित सेवा प्रबंधकों द्वारा किसी विधि विशेष को अत्यधिक प्रोत्साहन दिए जाने को भी दर्शाता है। जहां तक बन्ध्यीकरण का मामला है, यह अटल है, इसमें अनुवर्ती सेवा की सीमित आवश्यकता होती है और इसलिए अन्य विधियों की अपेक्षा बन्ध्यीकरण को प्रोत्साहित करने पर बल दिया जाता है। इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि बन्ध्यीकरण को लोग स्वतः ही अपना रहे हैं और सब विधियों से इसे अधिक वरीयता दे रहे हैं।

किसी एक या कुछ विधियों को ही प्रोत्साहन दिए जाने से जीवन की कतिपय परिस्थितियों में केवल महिलाओं के लिए ही गर्भनिरोधक विकल्प सीमित हो जाते हैं। इस प्रकार भारत में महिला बन्ध्यीकरण पर बल दिया जाने का आशय है कि जो महिलाएं अपने परिवार का वांछित आकार पूरा कर चुकी हैं केवल वही महिलाएं गर्भ निरोध के साधनों का प्रयोग करने के लिए योग्य है। जननक्षमता दरों में निरंतर गिरावट आऩे के कारण यह अनिवार्य है कि हमें अत्यधिक संतुलित "मिश्रित विधि" का प्रयोग करना चाहिए।

इंजेक्शन द्वारा दिए जाने योग्य गर्भनिरोधकों के चलन का भारत में कुछ लोग विरोध क्यों करते हैं?
नई गर्भ निरोधक टेक्नोलॉजी जैसे कि इंजेक्शन द्वारा दिए जाने योग्य, और आरोपित किए जाने वाले (इम्प्लान्ट) हार्मोनल आक्रामक प्रवृति के होते हैं, दीर्घकाल तक क्रियाशील रहते हैं और जब विकासशील देशों में उनका उपयोग महिलाओं को लक्ष्य करके किया जाता है। तब इनके दुरूपयोग की अधिक संभावना रहती है। इसके अलावा इंजेक्शन से दिए जाने योग्य गर्भनिरोधकों से स्वास्थ्य के लिए जोखिम होता है जो भारत में कमजोर शरीर महिलाओं द्वारा सुगाता से सहन नहीं किया जा सकता, इस प्रकार, इसका उपयोग तो आसानी से किया जा सकता है परन्तु यह इसके साथ-2 स्वास्थ्य संबंधी नई-2 समस्याओं को जन्म देता है जिससे महिला कहीं की भी नहीं रहती।

अधिकांश भारतीय महिलाओं के स्वास्थ्य की स्थिति और उनकी जानकारी का स्तर अच्छा नहीं होता तथा इन पर आक्रामक टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जाता है तब उसके परिणाम खतरनाक हो सकते हैं। इस टेक्नोलॉजी के प्रभावी प्रयोग के लिए स्क्रीनिंग और फॉलोअप मूल सिद्धांत है। चूंकि इन दोनों को उस प्रणाली में सुरक्षित नहीं माना जा सकता जिस पर अवसंरचना और मानव संसाधनों के लिए अधिक दबाव डाला जाता है। बहुत से लोग यह तर्क देते हैं कि ऐसी विधियों को चलन से दिए जाने योग्य गर्भनिरोधक भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के स्वास्थ्य कार्यक्रम और परिवार कल्याण कार्यक्रम के भाग नहीं है परन्तु बाजार में उपलब्ध है।

 
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