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विकास और जनसंख्या

क्या जनसंख्या विकास की समस्या है?
हां, यह विकास की समस्या है। जनसंख्या को प्रायः लोगों की बढ़ती हुई संख्या की समस्या के रूप में देखा जाता है। परन्तु तथ्य यह है कि बढ़ती हुई संख्या केवल मात्र सामाजिक और आर्थिक विकास के अभाव का नमूना है। ऐसे समाज मे सामाजिक आर्थिक विकास का स्तर कम होता है तथा बच्चों की संख्या अधिक होने के अवसर अधिक होते हैं।

भारत के विभिन्न राज्यों मे यह अंतर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, उदाहरणार्थ - उत्तर प्रदेश मे साक्षरता 56.3 प्रतिशत है और केवल 14 प्रतिशत महिलाओं को प्रसवपूर्ण स्वस्थ्य संबंधी सुविधाएं प्राप्त हो पाती हैं। उत्तर प्रदेश में प्रति दंपत्ति चार बच्चों का औसत है, जो कि केरल में प्रति दंपत्ति बच्चों की संख्या से लगभग दुगुना है। जहां (केरल में) लगभग प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित है और प्रत्येक महिला की प्रसवपूर्ण पूर्णतः देखरेख की जाती है और किसी स्वास्थ्य संस्था में बच्चे को जन्म देती है। इस प्रकार केरल अपने उन्नतिशील विकास के कारण दो दशक पहले ही "जनक्षमता का प्रतिस्थापन स्तर" प्राप्त कर चुका है, जबकि उत्तर प्रदेश को यह स्तर प्राप्त करने में अभी 20 वर्ष का समय और लगेगा क्योंकि इसकी जनन क्षमता अधिक है (कुल जनन क्षमता दर 4.4)

क्या हम विकास पर ध्यानकेन्द्रित कर सकते हैं और जनसंख्या वृद्धि को अनियंत्रत छोड़ सकते हैं?
नहीं। चूंकि सामाजिक-आर्थिक विकास का लाभ मिलने में बहुत समय लगता है, इसलिए ऐसे उपाय करना महत्वपूर्ण है जिससे कि लोगों को अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं सुगमता से उपलब्ध हो सकें, जिनका उनके जनन स्वास्थ्य आचरण पर प्रत्यक्ष पड़ता है, इसके अंतर्गत अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं जिनके अंतर्गत उन लोगों को गर्भनिरोधक सेवाएं उपलब्ध कराना शामिल है जो बच्चे पैदा नहीं करना चाहते परन्तु परिवार नियोजन की विधियों तक उनकी पहुंच नहीं है, ऐसा करने से भारत मेंकम से कम 20 प्रतिशत बच्चे कम पैदा होंगे।

गर्भ निरोधक सेवाओं को तीन भागों मे विभाजित किया गया है - (क) किसी विशिष्ट विधि को क्यों, कब और कैसे प्रयोग किया जाए, यह परामर्श देना, (ख) पसंद की गई विधि की सुगमता से उपलब्धता और सुलभता सुनिश्चित करना और (ग) यह सुनिश्चित करना कि उस विधि का निरंतर और कष्ट रहित प्रयोग किया जा रहा है।

इसके साथ-साथ किशोर यौन और जनन स्वास्थ्य सेवाओं को विशेषतः नव युवकों तक पहुंचाने की आवश्यकता है ताकि वे अपने यौन और जनन संबंधी आचरण के विषय में अवगत और उत्तरदायी निर्णय ले सकें, इस वह आयु भी सम्मिलित है जिस आयु में वे शादी करना चाहते हैं तथा बच्चे पैदा करना चाहते है। इससे युवकों को सुरक्षित यौन संपर्क के लिए कण्डोम और गर्भ निरोधक अन्य विधियों का प्रयोग करने में सहायता मिलेगी ताकि पहला बच्चा देर से पैदा हो और अनुवर्ती गर्भों के बीच पर्याप्त अंतर बना रहा।

बच्चे को पोषण देने के लक्ष्य अलग से बताए जाने चाहिए। विद्यालयों में "मध्य-अवकाश-आहार" (मिड-डे-मील) योजना के कारण बच्चे ज्यादा संख्या में विद्यालय जाने लगे हैं तथा बच्चों की आहार संबंधी स्थिति मे सुधार हुआ है। यह योजना बच्चे के जीवित रहने की स्थिति मे सुधार लाने और बड़े परिवार की इच्छा को कम करने में प्रभावी में सिद्ध हुई है।

जनसंख्या स्थिरीकरण में शिक्षा /साक्षरता का महत्वः
शिक्षा विशेषतः महिलाओं की शिक्षा और परिवार के आकार, (जितना बड़ा वे रखना चाहे) के मध्य स्पष्ट संबंध है। जो महिलाएं अशिक्षित है, उनके औसतन प्रति महिला 3.74 बच्चे पाए जाते हैं और यदि माता-पिता कम सम कम दसवीं परीक्षा उत्तीर्ण हैं तो बच्चों का यह औसत 1.99 ही रह जाता है। राज्यों के निष्पादन में भी यह संबंध दिखाई देता है। केरल, जहां कि साक्षरता दर सबसे अधिक है, की कुल जनन क्षमता 1.9 है इसके विपरीत राजस्थान में जहां साक्षरता 60.4 प्रतिशत है और वहां कुल जननक्षमता 3.2 है।

इस प्रकार, साक्षरता और शिक्षा, विशेषतः महिला साक्षरता का जनसंख्या कम करने से सीधा संबंध होता है। यह इसलिए है कि एक सुशिक्षित महिला सूचना और स्वास्थ्या सेवा केन्द्रों पर अधिक संपर्क करने के बजाय अपने स्वास्थ्य अपने बच्चों के संबंध में निर्णय ले सकेगी।

जनसंख्या की अशुद्ध परिभाषिक शब्दावली
नीति निर्माता, जनसांख्यिक और विकास कार्यों से जुड़े वर्ग "अत्यधिक आबाद" "जैसे शब्दों का प्रयोग करने से बचते है और जनसंख्या को एक समस्या" के रूप में नहीं मानते।

विद्वान व्यक्ति "अत्यधिक आबादी" या 'जनसंख्या विस्पोट' जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करते। क्योंकि "अत्यधिक आबादी" शब्द से जो एक वर्ग निकलता है वही अर्थ दूसरा वर्ग नहीं निकालता। दूसरी बात यह है अत्यधिक आबादी से यह अर्थ भी निकलता है कि कुछ आबादी अनावश्यक या अवांछित है और इसलिए वह समाज पर भार है।

ऐसे अर्थ निकालने से बचा जाना चाहिए, विशेषतः इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि विकासशील देशों और समाज के गरीब वर्गों में जनसंख्या का तेजी से बढ़ना उसकी प्रवृति है। कभी-कभी वे वर्ग उन कार्यकर्मो के लिए लक्ष्य बन जाते हैं जिनका उद्देश्य अत्यधिक आबादी को नियंत्रित करना है, तथा सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को समाज के उन अत्यधिक सुविधा प्राप्त लोगों से अलग कर दिया जाता है जो प्रायः निर्णय लेने वाले वर्ग में से होते हैं।

तथापि, तथ्य यह है कि जनसंख्या बढ़ रही है, यह कोई विवाद का विषय नहीं है, और इससे संबंधित समस्याओं पर जानकारी देने की तत्काल आवश्यकता है। वर्ष 2000 में घोषित राष्ट्रीय जनसंख्या नीति में सन् 2045 तक स्थिर जनसंख्या प्राप्त करने के लिए "लंबी अवधि" तय की गई। तथापि, भारत 2010 तक 2.1 की कुल जननक्षमता दर का लक्ष्य प्राप्त कर लेगा।

 
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