हम
कल के
माता-पिता
कैसे बन
सकते
हैं?
भारत
में 15-34
वर्ष की
आयु
वर्ग
में 3480
लाख लोग
विद्यमान
है।
तथापि,
इतने
अधिक
लोगों
को विषम
सामाजिक
और
आर्थिक
विकास
के कारण
अपनी
पूर्ण
अंतःशक्ति
प्राप्त
करने के
सीमित
अवसर
प्राप्त
है।
भारत के
नौजवान
अपने
कौशल का
विकास
करने,
शिक्षा
प्राप्त
करने और
रोजगार
प्राप्त
करने के
अवसरों
की मांग
करते
हैं।
भारत
में
विकास
संबंधी
हमारे
सभी
प्रयास
केवल
शरहों
में ही
नहीं
बल्कि
गांवों
में भी
किए
जाने
चाहिए
जहाँ
भारत की
अधिकांश
जनता
रहती
है।
क्या
आज की
युवा
पीढ़ी
अपनी उन
पूर्व
पीढ़ियों
की
भांति
बड़ा
परिवार
रखना
पसंद
करेगी,
जिनके
लिए
गर्भनिरोधक
के
विकल्प
सीमित
थे और
स्वास्थ्य
संबंधी
सेवाएं
भी
अच्छी
स्तर की
नहीं थी
अथवा
क्या
उन्हें
इस
संबंध
में
जानकारी
उपलब्ध
कराई
जाएगी
और वे उस
मार्ग
को
अपनाने
में
समर्थ
होंगे
जो
जनसंख्या
स्थिरीकरण
की ओर ले
जाता है?
यह
चुनौती
यह
सुनिश्चित
करने पर
निर्भर
है कि 3480
लाख
व्यक्ति
स्वास्थ्य
और
गर्भनिरोधक
सेवाओं
के लाभ
प्राप्त
कर रहे
हैं
क्योंकि
वे लोग
ही वह
जन्म दर
निश्चित
करेंगे
जिस पर
भारत की
जनसंख्या
की
भविष्य
में
वृद्धि
होगी।
0-14
वर्ष की
आयु
वर्ग के
बच्चों
के लिए
पोषण,
उनके
स्वास्थ्य
की
देखरेख
करने और
उनहें
प्राथमिक
शिक्षा
दिलाने
पर
ध्यान
दिया
जाना
चाहिए
क्योंकि
वे
बच्चे
ही
भविष्य
की
आधारशिला
का
प्रतिनिधित्व
करते
हैं।
उनके
विकास
काल में
उन पर
किया
गया
निवेश
उनहें
एक
समझदार
और
शिक्षित
नागरिक
बनाएगा।
विश्व
की
जनसंख्या
जनसांख्यिक
संक्रमण
क्या है?
"जनसांख्यिक
संक्रमण"
एक मॉडल
है जो एक
लंबे
समय के
दौरान
हुए
जनसंख्या
परिवर्तन
दर्शाता
हैं। यह
"जनसंख्या
वृद्धि
के उन
चार
स्तरों
को
स्पष्टतः
परिभाषित
करता है
जिनमें
से
राष्ट्रों
को अपने
सामाजिक
आर्थिक
विकास
के साथ
आगे-पीछे
गुजरना
पड़ता
है।
स्तर-1
: यह
अल्प
विकसित
देशों
में
विशिष्ट
रूप से
देखा
जाता
है।
यहां
जन्म दर
अधिक
होती है
परन्तु
बहुत
बड़ी
संख्या
में लोग
निरोध्य
कारणों
से
मृत्यु
के मुंह
में जले
जाते
हैं
जिससे
जनसंख्या
स्थिर
रहती
है।
स्तर
- 2 : मृत्यु
दर में
बहुत
तेजी से
गिरावट
आती है
क्योंकि
निरोध्य
कारणों
से होने
वाली
मौतों
को
बेहतर
आहार
आपूर्ति
और
उन्नत
जन
स्वास्थ्य
कार्यक्रम
के जरिए
कम कर
दिया
जाता है,
परन्तु
उच्च
जननक्षमता,
कम
सामाजिक
विकास
और
स्वास्थ्य
एवं
गर्भनिरोधक
सेवाओं
तक
सीमित
पहुंच
के कारण
जन्म दर
अधिक ही
बनी
रहती
है। इस
कारण
जनसंख्या
बहुत
तेजी से
बढ़ती
है।
स्तर-3
: जन्म
दर में
गिरावट
आती है
परन्तु
जनसंख्या
निरंतर
बढ़ती
रहती है
क्योंकि
पूर्ववर्ती
पीढ़ियों
की उच्च
जननक्षमता
के कारण
जनन आयु
वर्ग के
लोगों
की
संख्या
काफी
अधिक
होती
है।
स्तर
- 4 : देश
निम्न
जन्म और
निम्न
मृत्यु
दरों के
साथ एक
बार
पुनः
जनसंख्या
में
स्थिरता
प्राप्त
कर लेते
हैं
लेकिन
सामाजिक
और
आर्थिक
विकास
का स्तर
ऊँचा
रहता
है।
जनसंख्या
स्थिर
तो रहती
है
लेकिन
स्तर-1
की
जनसंख्या
से अधिक
होती
है।
उच्च
मृत्युदर
और उच्च
जननक्षमता
के साथ
स्थिर
जनसंख्या
से
निम्न
मृत्युदर
और
निम्न
जननक्षमता
के साथ
स्थिर
जनसंख्या
और उच्च
जननक्षमता
के साथ
स्थिर
जनसंख्या
से
निम्न
मृत्युदर
और
निम्न
जननक्षमता
के साथ
स्थिर
जनसंख्या
का होना
यह
संक्रमण
जनसांख्यिक
संक्रमण
कहलाता
है। इस
समय
भारत
तीसरे
स्तर से
गुजर
रहा है।
विकासशील
देश
जनसांख्यिक
संक्रमण
प्राप्त
करने
में
पीछे
क्यों
है?
विकासशील
देश
ऐतिहासिक
कारणों
से
जनसांख्यिक
संक्रमण
प्राप्त
करने
में
पीछे
है।
विकसित
विश्व
में 1800
वीं
शताब्दी
के
दौरान
औद्योगिक
क्रान्ति
हुई
जिसके
समग्र
विकास
और
संपन्नता
की लहर
दौड़ गई
जिसके
परिणाम
स्वरूप
मृत्यु
और जन्म
दोनों
दरों
में कमी
आ गई
विकासशील
विश्व
ने
उपनिवेशबाद
और कम
वृद्धि
के कारण
यह अवसर
खो
दिया।
स्थानीय
गरीबी,
शिक्षा
का
निम्न
स्तर और
परिवार
नियोजन
कार्यक्रमों
के अभाव
के कारण
विकासशील
देशों
के अनेक
भागों
में
प्रत्येक
महिला
ने औसतन
छ: से
अधिक
बच्चों
को जन्म
दिया।
उच्च
जनसंख्या
वृद्धि
के इस
लंबे
समय के
परिणाम
स्वरूप
युवा
जनसंख्या
अधिक हो
गई
जिससे
जनसंख्या
वृद्धि
में
उच्च
संवेग
आया और
जनसांख्यिक
संक्रमण
की अवधि
दीर्घ
हो गई।
भारत
और
जनसंख्या
जनसंख्या
स्थिरीकरण
से क्या
आशय है?
जनसंख्या
स्थिरीकरण
एक वह
स्तर है
जहां
जनसंख्या
के आकार
में कोई
परिवर्तन
नहीं
होता।
इसे
शून्य
जनसंख्या
वृद्धि
स्तर भी
कहा
जाता
है। जब
जन्मदर
और
मृत्युदर
बराबर
हो जाती
है तो यह
कहा
जाता है
कि
जनसंख्या
स्थिर
हो रही
है।
तथापि,
देश
विशेष
के
मामले
में देश
में आने
वाले और
देश से
बाहर
जाने
वाले
लोगों
की भी
गणना
जनसंख्या
में की
जाती
है। देश
स्तर पर
जनसंख्या
उस समय
स्थिर
होती है
जब देश
में
जन्मे
बच्चों
और देश
में आने
वाले
व्यक्तियों
की
संख्या
देश में
मरने
वालों
और देश
से बाहर
जाने
वाले
व्यक्तियों
के
बराबर
हो जाती
है।
जनसंख्या
स्थिरीकरण
के लिए
जन्म
लेने
वाले
प्रत्येक
बच्चे
के लिए
एक
व्यक्ति
को मर
जाना
चाहिए
परन्तु
मरने
वाले
बूढ़े
लोगों
की
अपेक्षा
अधिकांश
युवा
दंपत्ती
अपना
परिवार
प्रारम्भ
करते है,
जिससे
जनसंख्या
में
निरंतर
वृद्धि
होती
है। यह
जनसंख्या
संवेग
कहलाता
है।
इस
प्रकार,
प्रतिस्थापन
स्तर
जननक्षमता
(प्रति
दंपत्ति
2 बच्चे)
और
जनसंख्या
स्थिरीकरण
प्राप्त
करने के
बीच कुछ
दशकों
का अंतर
रहता
है।
भारत ने
2010 तक
जननक्षमता
का
प्रतिस्थापन
स्तर
प्राप्त
करने का
अपना
लक्ष्य
तय कर
लिया है
ताकि
वर्ष 2045
तक
जनसंख्या
स्थिरीकरण
का वृहत
लक्ष्य
प्राप्त
किया जा
सके-35
वर्ष का
अंतर
जनसंख्या
संवेग
के लिए
रखा गया
है।
जनसंख्या
इतनी
तेजी से
क्यों
बढ़ रही
जबकि
प्रति
महिला
बच्चों
की औसत
संख्या
कम हो
रही है?
भारत
में
प्रति
वर्ष 180
लाख
व्यक्ति
बढ़ते
रहते
हैं
क्योंकि
50
प्रतिशत
से अधिक
जनसंख्या
जनन आयु
वर्ग की
है। यह
युवा
लोगों
का वृहत
आधार है
जो
जनसंख्या
वृद्धि
को
संवेग
देता है
पूर्ववर्ती
वर्षों
में
उच्चजन्म
दर होने
के कारण
जनन आयु
वर्ग
में आने
वाले
व्यक्तियों
की
संख्या
प्रति
वर्ष
बढ़ रही
है।
देर
से शादी
करके
तथा
बच्चे
देर से
पैदा
करके और
दो
बच्चों
के बीच
पर्याप्त
अंतर
रखकर
जनसंख्या
संवेग
को रोका
जा सकता
है।
जनसंख्या
वृद्धि
को
प्रबावित
करने
वाले
कौन से
घटक है?
देश
में
जन्म
लेने
वालों
और मरने
वालों
की
संख्या
के बीच
के अंतर
का पता
प्राकृतिक
वृद्धि
से लगता
है। देश
में
मृत्यु
दर में
कमी आई
है
परन्तु
जन्म दर
ऊँची
रही है,
जन्म दर
ऊँची
होने के
दो कारण
हैं -
प्रथम
कारण है
अवांछित
और
अनायोजित
जननक्षमता-गर्भनिरोधक
सेवाओं
तक
पहुंच
का अभाव
होने के
कारण
जन्मे
बच्चे
भी "अनापूर्ति
आवश्यकता"
के रूप
में
जाने
जाते
हैं।
प्रत्येक
वर्ष 260
लाख
जन्म
लेने
वालों
में से 45
प्रतिशत
ऐसे
बच्चे
होते
हैं जो
तीन या
तीन से
अधिक
बच्चों
के बाद
पैदा
होते
हैं।
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