लिंग
और
जनसंख्या
सशक्तिकरण
और
जनसंख्या
बंध्यीकरण
सशक्तिकरण
शब्द को
महिलाओं
की
शिक्षा
और उनके
रोजगार
के
संदर्भ
में
संकुचित
रूप में
परिभाषित
किया
जाता है,
जबकि ये
दोनों
महिलाओं
के जीवन
पर
सकारात्मक
परन्तु
सीमित
प्रभाव
रखते
हैं।
सशक्तिकरण
का आशय
काफी
विस्तृत
है।
यह
किसी
महिला
की वह
योग्यता
है
जिसके
आधार पर
वह कब
शादी
करना
चाहती
है, कब
कितने
बच्चों
को उसे
जन्म
देना है
और उन
स्वास्थ्य
सेवाओं,
जो वह
स्वयं
अपने और
अपने
परिवार
के लिए
प्रयोग
करती है,
आदि से
संबंधित
निर्णायक
लेने
में वह
भाग
लेती
है।
स्वास्थ्य
और
जनसंख्या
कार्यक्रमों
की
सफलता
को ये
सभी
कारक
प्रभावित
करते
हैं
जनसंख्या
कार्यक्रमों
में
पुरूषों
पर
ध्यान
केन्द्रित
करनाः
स्वास्थ्य
और
जनसंख्या
कार्यक्रमों
में
निम्नलिखित
कारणों
से
पुरूषों
को
शामिल
किया
जाना
आवश्यक
हैः
- पुरूष
घर में
निर्णय
लेने
में
महत्वपूर्ण
भूमिका
अदा
करते
हैं और
परिवार
के
आकार,
गर्भनिरोध
या
स्वास्थ्य
की
देखरेख
से
संबंधित
निर्णय
लेने
में
महिलाओँ
की
अपेक्षा
पुरूष
बेहतर
स्थिति
मे
होते
हैं।
- पुरूष
बन्धीयकरण
के लिए
नसबंदी
एक
सुविधा
जनक और
आसान
विकल्प
है।
- कण्डोम
अन्तर्वेधी
नहीं
है और
सुरक्षित
विधि
है और
बीमारियों
तथा
गर्भ
के
प्रति
दोनों
को
सुरक्षा
प्रदान
करता
है।
परंपरागत
चली आ
रही
व्यवस्था
में
महिलाएं
कण्डोम
का
प्रयोग
करने
के
संबंध
में
अपने
पतियों
के साथ
समझौता
नहीं
कर
पाती।
- जनन
भाग के
संक्रमण
और
यौनसंचारित
संक्रमण
के
प्रभावी
उपचार
के लिए
पति-पत्नी
दोनों
की
भागीदारी
अपक्षित
है।
- बच्चे
की
देखरेख
का
उत्तरदायित्व
पति-पत्नी
दोनों
पर
होनो
के
परिणामस्वरूप
महिलाओं
को
दूसरे
कार्य
करने
का
अवसर
प्राप्त
हो
जाता
है।
मातृ
दर और
जनसंख्या
कार्यक्रम
मातृ
मृत्युदर
शब्द
केवल
मातृक
कारणों
से मरने
वाली
महिलाओं
के बारे
में ही
प्रयुक्त
नहीं
किया
जाता।
यह उस
मूल्य
का सूचक
है जो
समाज
द्वारा
किसी
महिला
के जीवन
और
स्वास्थ्य
को दिया
जाता
है।
उच्च
मातृ-
मृत्युदर
यह
बताती
है कि
अधिकांश
महिलाओं
को जीवन
में बार-बार
गर्भधारण
करना
पड़ता
है
जिससे
संतुलित
आहार और
बुरे-स्वास्थ्य
का खतरा
पैदा हो
जाता
है। यह
या तो
पुत्र
की
लालसा
के कारण
होता है
या फिर
किसी
गर्भनिरोधक
विधि का
प्रयोग
नहीं
करते
जिससे
कि
महिलाओं
को
गर्भधारण
न करना
पड़ता
है।
ऐसी
महिलाओ
से
जन्में
बच्चों
का भार
जन्म के
समय कम
होता है
अर्थात,
जन्म के
समय वे
कमजोर
होते
हैं और
संभवतः
अपने
जन्म से
एक वर्ष
के भीतर
मौत के
मुंह
में चले
जाते
हैं।
इससे और
बच्चे
पैदा
करने के
लिए
महिलाओं
पर दबाब
पड़ता
है और
उनके
जीवन को
खतरा
पैदा हो
जाता
है।
इस
प्रकार
मातृ
मृत्युदर
को कम
करने के
लिए ऐसे
हस्तक्षेप
की
आवश्यकता
है जो
मां और
बच्चे
के
समग्र
स्वास्थ्य
संबंधी
समस्त
कार्यक्षेत्र
को
प्रभावित
करे।
मातृ
मृत्युदर
केवल
गर्भ के
परिणामों
को
बताने
वाला
सचक
नहीं है
बल्कि
यह
महिलाओं
के
समग्र
स्वास्थ्य,
सशक्तिकरण,
सामाजिक-आर्थिक
स्थिति
और उन
अच्छे
स्तर की
स्वास्थ्य
सेवाओं
की
उपलब्धता
को
बताने
वाला
सूचक है
जिनके
कारण
कोई
महिला
गर्भनिरोधक
विकल्पों
का
प्रयोग
करने
में
समर्थ
होती
है।
यह
अनुमान
है कि
प्रति
वर्ष कम
से कम 20
प्रतिशत
माताओं
को मौत
के मुंह
में
जाने से
बचाया
जा सकता
है
बशर्ते
कि वे
सभी
महिलाएं
जो और
बच्चे
पैदा
नहीं
करना
चाहती,
उन्हें
गर्भधारण
ने करना
पड़े
गर्भनिरोधक
का
प्रयोग
करने से
अवांछित
और
जोखिम
पूर्ण
गर्भ को
रोककर
मातृ
मृत्युदर
को कम
किया जा
सकता है
और फिर
गर्भपात
कराने
की
आवश्यकता
भी कम हो
जाएगी।
मातृ-मृत्यु
घर
पर
सामान्य
प्रसव
होने के
मां
जीवन को
कोई भी
खतरा
नहीं
होता
परन्तु
प्रसव
के समय
प्रशिक्षित
आया आदि
का अभाव,
प्रसव
पूर्व
उचित
देखरेख
ने करने,
सफाई का
ध्यान
रखने और
अप्रशिक्षित
आया
द्वारा
अशोधित
विधियों
का
प्रयोग
किए
जाने से
गर्भ और
प्रसव
सामान्य
होने पर
भी
महिला
के जीवन
को खतरा
पैदा हो
जाता
है।
60
प्रतिशत
से अधिक
महिलाओं
की
मृत्यु
प्रसव
के
तुरंत
बाद हो
जाती है,
और आधे
से अधिक
महिलाओं
की
मृत्यु
प्रसव
के एक
दिन के
भीतर हो
जाती
है। इस
प्रकार
मरने
वाली
महिलाओं
में से
अधिकांश
महिलाओं
को
बचाया
जा सकता
है
बशर्ते
कि
प्रसवोत्तर
आने
वाली
परेशानियों
का समय
पर पता
लगाया
जाए और
किसी
स्वास्थ्य
कार्यकर्ता
द्वारा
उनकी
देखरेख
की जाए।
घर पर
प्रसव
कराने
वाली
सभी
महिलाओं
की जांच,
प्रसव
के दो
दिन के
भीतर,
किसी
स्वास्थ्य
कार्यकर्ता
द्वारा
उनके घर
पर ही की
जानी
चाहिए।
परन्तु
ऐसी
जांच की
सुविधा
केवल 2.3
प्रतिशत
महिलाओं
को ही
मिल
पाती
है।
लगभग
72
प्रतिशत
महिलाओं
की
मृत्यु
के लिए
उत्तरदायी
निम्नलिखित
पांच
प्रत्यक्ष
कारण
हैं
अधिक
रक्त
स्राव
होना या
रक्त
स्राव (हेमरिज)
होना,
संक्रमण
या
पूतिता (सेप्सिस),
असुरक्षित
गर्भपात,
दुष्कर
या
बाधित
प्रसव
और
गर्भवस्था
से
संबंधित
उच्च
रक्त
दाब।
अन्य 20
प्रतिशत
मृत्यु
गर्भावस्था
से
संबंध
परिस्थितियों
के कारण
होती है,
जैसे कि
मलेरिया,
रक्त की
कमी
होना और
एडस।
असुरक्षित
गर्भपात
गर्भपात
भारत
में वैध
है और यह
गर्भ का
चिकित्सा
विधि
द्वारा
समापन (एम.
टी. पी.)
अधिनियम
द्वारा
नियंत्रित
होता
है। यह
अधिनियम
1975 में
पास
किया
गया था।
इस
अधिनियम
के
अंतर्गत
एम. टी.
पी
गर्भधारण
करने की
तारीख
से 20
सप्ताह
के भीतर
कराया
जा सकता
है।
विधि
में यह
निर्दिष्ट
किया
गया है
कि
गर्भपात
सरकारी
अस्पताल
या एम.टी.पी
के लिए
अनुमोदित
निदानशाला
के
अलावा
अन्य
किसी भी
स्थान
पर नहीं
किया
जाएगा।
भारत मे
इस एम.
टी. पी
अधिनियम
के अधीन
प्रतिवर्ष
लगभग 10
लाख
गर्भपात
कराए
जाते
हैं।
तथापि,
यह
अनुमान
है कि
लगभग 60
लाख
गर्भपात
उन
विभिन्न
चिकित्सकों
और गैर
चिकित्सों
व्यवसायियों
(एन. एम.
पी.)
द्वारा
कराए
जाते
हैं जो
अयोग्य/अप्रशिक्षित
होते
हैं और
अप्रमाणित
स्थानों
पर "प्रैक्टिस"
करते
हैं।
प्रमाणिक
केन्द्रों
तक
पहुंच
का भाव,
असुरक्षित
गर्भपात
के
खतरों
के बारे
में
अज्ञानता,
विवाहेतर
शारीरिक
संबंधों
से रहने
वाले
गर्भ के
साथ
जुड़े
कलंक को
गुप्त
रखने की
इच्छा,
एकान्ता
और
गोपनीयता
के अभाव
या जिन
नियोक्ताओं
की
गर्भनिरोध
पूर्वशर्त
है, उन
नियोक्ताओं
द्वारा
मजबूर
किए
जाने के
कारण
महिलाएं
अवैध
गर्भपात
कराती
हैं।
भारत
में
अवैध
गर्भपात
महिलाओं
की
मृत्यु
का
मुख्य
कारण
है। जो
महिलाएं
लिंग का
चयन
करने के
बाद
गर्भपात
कराती
हैं वे
अवैध
गर्भपात
कहे
जाते
हैं तथा
ऐसे
गर्भपात
असुरक्षित
गर्भपात
केन्द्रों
पर मौत
का कारण
भी हो
सकते
हैं।
मातृ
मृत्युदर
कम करने
के लिए
क्या
उपाय
किए
जाने
चाहिएः
मातृ
मृत्युदर
कम करने
के लिए
पहला
उपाय है
-
प्रसवपूर्ण,
प्रसव
के
दौरान
और
प्रसवोत्तर
अच्छी
प्रकार
से
देखभाल
करना
जिससे
गर्भावस्था
के
दौरान
होने
वाले
उच्च
जोखिम
का पता
चलता है
और उस
समय
उचित
सहायता
उपलब्ध
कराई जा
सकती
है।
अनुमोदित
संस्थाओं
में
प्रसव
कराने
को
बढ़ावा
देकर और
प्रसव
कराने
वाली
परिचारिकाओं
को
प्रशिक्षण
देकर
तथा जो
महिलाएँ
अभी भी
घर पर
प्रसव
कराती
हैं
उन्हें
सुगमता
से
उपलब्ध
सुरक्षित
प्रसव
किट
उपलब्ध
कराकर
यह
सुनिश्चित
किया
जाना
चाहिए
कि
प्रसव
सुरक्षित
कराए जा
रहे
हैं।
प्रसूति
संबंधी
जटिलताओँ
की
देखरेख
की
व्यवस्था
को
सुदृढ
करना और
आपात
प्रसूति
सेवाओं
की
वृद्धि
करना भी
महत्वपूर्ण
है।
प्रसूति
संबंधी
जटिलताओं
के
प्रति
सुग्राही
परिवार
और समाज
के
व्यक्तियों
के
सामाजिक
आधारित
परिवहन
उपलब्ध
कराकर
और यह
सुनिश्चित
करके कि
स्वास्थ्य
केन्द्रों
पर आपात-संबंधी
देखरेख
गुणवत्त
के साथ
की जा
रही है,
उन
मौतों
को काफी
मात्रा
में कम
किया जा
सकता है
जो
प्रसव
के समय
चिकित्सा
सुविधाओँ
के
मिलने
में
विलम्ब
होने के
कारण
होती
हैं।
किशोर
यौन और
जनन
स्वास्थ्य
कार्यक्रमों
से
उत्तरदायी
यौन
आचरण
अपनाने
में
सहायता
मिलती
है,
जिससे
कम उम्र
में
रहने
वाले
गर्भों
और
अविवाहित
गर्भों
की
संख्या
कम हो
जाती है
जो
अविवाहित
अवस्था
में
रहने
वाले
गर्भ से
जुड़े
कलंक के
कारण
भारत
में
प्रायः
अवैध
गर्भपात
कहलाते
हैं।
सुरक्षित
गर्भपात
केन्द्रों
तक सुगम
पहुंच
उपलब्ध
कराने
से
महिलाओं
को अपने
जीवन का
जोखिम
उठाए
बिना
अवांछित
गर्भ
गिरवाने
में
सहायता
मिलेगी।
प्रभावी
गर्भनिरोधक
विधियों
का
प्रयोग
करके भी
अवांछित
गर्भ और
अवैध
गर्भपात
को रोका
जा सकता
है।
गर्भावस्था
के
दौरान
महिलाओं
के
जीवित
रहने के
अवसरों
में
वृद्धि
करने के
लिए
गर्भ
में पल
रही
कन्या
और
महिला
दोनों
के
समग्र
स्वास्थ्य
और आहार
के स्तर
में
सुधार
करना
समान
रूप से
महत्वपूर्ण
है।
प्रबल
लोकाचारों
और
रिवाजों
के कारण
महिलाओं
के
स्वास्थ्य
और आहार
पर कम
ध्यान
दिया
जाता
है।
जिसके
परिणाम
स्वरूप,
महिलाओं
का
स्वास्थ्य
खराब हो
जाने के
बावजूद
भी
उन्हें
स्वास्थ्य
संबंधी
सेवाओं
का
उपयोग
करने के
लिए
सक्रिय
रूप से
प्रोत्साहित
नहीं
किया
जाता।
अतः
व्यक्तिगत,
परिवारगत,
और समाज
स्तर पर
लोगों
के
मानसिक
विचारों
को
बदलने
के लिए
आवश्यक
कार्य
किए
जाने की
आवश्यकता
है ताकि
समाज
में
महिलाओं,
विशेषतः
गर्भवती
महिलाओं
को उसी
प्रकार
सम्मान
प्राप्त
हो जिस
प्रकार
उच्चतम
प्राथमिकता
प्रप्त
करने
योग्य
व्यक्ति
को
प्राप्त
होता
है।
मां
और
बच्चे
के
जीवित
रहन के
लिए
प्रसव
पूर्व
देखरेख
किस
प्रकार
महत्वपूर्ण
है?
प्रसवपूर्व
देखरेख
के
अंतर्गत
कम से कम
पांच
मूल
सेवाएं
सम्मिलित
हैं -
गर्भावस्था
में
अनुवीक्षण
करना, (टेटनस)
का टीका
लगाना,
आयंन और
एसिड (आई.एफ.ए)
की
गोलियां
देना और
पोषण/सुरक्षित
प्रसव
संबंधी
परामर्श
देना।
इन
उपायों
से
महिलाएं
गर्भावस्था
की
समस्त
अवधि के
दौरान
सुरक्षित
रह सकती
हैं और
यह
सुनिश्चित
कर सकती
है कि
नवजात
बच्चा
स्वस्थ
होगा।
तथापि,
बहुत सी
महिलाएं
इन
मूलभूत
सेवाओँ
का
उपयोग
करने की
स्थिति
में
नहीं
होती,
जिसके
परिणाम
स्वरूप
अरक्तता,
रतौंधी,
जन्म के
समय
बच्चे
का वजन
कम होना
या
प्रसव
संबंधी
रक्त
स्राव
जैसी
परिहार्य
जटिलताओं
की वे
शिकार
हो जाती
हैं।
मां
और
बच्चे
के
स्वास्थ्य
और जीवन
पर
प्रसवपूर्ण
देखरेख
के
प्रभाव
का
महत्व
स्वतः
स्पष्ट
है, जिन
राज्यों
में
प्रसवपूर्व
देखरेख
अच्छे
स्तर पर
की जाती
है वहां
शिशु
मृत्यु
दर में
काफी
कमी आई
है।
भारत
में घर
पर
प्रसव
कराना।
अत्यंत
कमजोर
तब के
लोग या
भारतीय
समाज
प्रसव
के लिए
संस्थागत
सुविधाएं
उपलब्ध
करने
में
असमर्थ
हैं। घऱ
पर
प्रसव
कराने
वाली
महिलाओं
में से 80
प्रतिशत
से अधिक
महिलाएं
अशिक्षित
होती
हैं और
निम्न
जीवन
स्तर से
गुजर
रही
हैं। घर
पर
प्रसव
कराने
वाली
महिलाओं
में से
लगभग 75
प्रतिशत
महिलाएं
ग्रामीण
क्षेत्रों
में
रहती
हैं। घर
पर
प्रसव
कराने
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