जनसंख्या
वृद्धि
का
प्रभाव
भारत
की
जनसंख्या
वृद्धि
दर में
कई
वर्षों
से कमी आ
रही है
परन्तु
कुल
जनसंख्या
में
निरंतर
वृद्धि
हो रही
है,
क्योकि
कुल
जनसंख्या
का 51
प्रतिशत
भाग जनन
आयु
वर्ग (15-49)
का है।
इसलिए
इस
जनसंख्या
में
प्रतिवर्ष
लाखों
लोग और
बढ़
जाते
हैं।
प्रतिवर्ष
260 लाख
बच्चे
पैदा
होते
हैं।
केवल 53
प्रतिशत
दंपत्ती
ही गर्भ
निरोधक
का
उपयोग
कर रहे
हैं।
प्रचलित
स्तर पर
जनसंख्या
को
स्थिर
करने
में अभी
कई
दशकों
का समय
और लग
सकता
है।
भारत
में
शिशु की
मृत्युदर
बहुत
अधिक
है।
बच्चों
को बार-बार
जन्म
देने से
ऐसा
लगता है
कि
मानों
कि शिशु
और
बच्चों
की
मृत्यु
के
विपरीत
बीमा
करा
दिया
गया हो।
अधिकांश
व्यक्ति,
गर्भनिरोध
संबंधी
सेवाएं
उपलब्ध
होते
हुए भी
उनकी
जानकारी
और
पहुंच
की
समस्याओं
के कारण
उनका
उपयोग
नहीं कर
सकते।
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| भारत
हमारे
समक्ष
चुनौती
भरा
कार्य
है। |
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भारत
विश्व
में
धनी
आबादी
वाला
दूसरा
देश
है,
यहां
विश्व
की
कुल
जनसंख्या
की 16.7
प्रतिशत
जनसंख्या
रहती
है।
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भारत
के
राज्यों
की
जनसंख्या
की
तुलना
कई
देशों
की
जनसंख्या
से
की
जा
सकती
है।
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भारत
की
जनसंख्या
का 50
प्रतिशत
हिस्सा
जनन
आयुवर्ग
का
है।
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वर्ष
2016 तक
इस
जनसंखा
में 1610
लाख
व्यक्ति
और
शामिल
हो
जाएगें।
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जनसंख्या
का
लगभग
42
प्रतिशत
भाग
उन
बच्चों
के
कारण
बढ़ता
है
जो
प्रति
परिवार
दो
बच्चों
के
बाद
पैदा
होते
हैं।
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भारत
के पास
विश्व
की
समस्त
भूमि का
केवल 2.4
प्रतिशत
भाग ही
है जबकि
विश्व
की
जनसंख्या
का 16.7
प्रतिशत
जनसंख्या
भारत
वर्ष
में
निवास
करती
है।
जनसंख्या
में
वृद्धि
होने के
साथ-साथ
प्राकृतिक
संसाधनों
पर और
भार बढ़
जाएगा।
जनसंख्या
दबाव के
कारण
कृषि के
लिए
व्यक्ति
को भूमि
कम
उपलब्ध
होगी
जिससे
खाद्यान्न,
पेय जल
की
उपलब्धता
पर
प्रतिकूल
प्रभाव
पड़ेगा,
इसके
अलावा
लाखों
लोग
स्वास्थ्य
और
शिक्षा
के
लाभों
एवं
समाज के
उत्पादक
सदस्य
होने के
अवसर से
वांचिर
हो
जाएंगे।
आधे
बिलियन
से अधिक
भारतीय
25 वर्ष
से कम
आयु के
हैं।
जिन
राज्यों
में
वृद्धि
दर अधिक
है वहां
मातृ
मृत्युदर
और शिशु
मृत्युदर
भी बहुत
अधिक
है। बार-बार
जन्म
देने से
मां और
बच्चे
दोनों
के
स्वास्थ्य
पर बुरा
असर
पड़ता
है और
उनके
जीवित
रहने का
जोखिम
भी बढ़
जाता
है।
स्वास्थ्य
एवं
परिवार
कल्याण
मंत्रालय
और
राष्ट्रीय
जनसंख्या
आयोग के
लिए
अन्तर्राष्ट्रीय
जनसंख्या
विज्ञान
संस्थान
द्वारा
2006 में
किए गए
अध्ययन
के
अनुसार
20 वर्ष
की आयु
से पहले
गर्भधारण
करने से
जन्म के
समय मां
और
बच्चे
दोनों
के लिए
जोखिम (खतरा)
बढ़
जाता
है।
जल्दी
बच्चा
पैदा
करने के
लिए
सामाजिक
दबाव और
उसके
बाद
अगले
बच्चे
के जन्म
में
पर्याप्त
अंतर न
होने के
कारण
मां के
स्वास्थ्य
पर
प्रतिकूल
प्रभाव
पड़ता
हैं और
शिशु की
मृत्यु
भी हो
सकती है
या
कमजोर
बच्चा
पैदा हो
सकता
है।
इससे
जन्म,
मृत्यु
और बुरे
स्वास्थ्य
का
दोषपूर्ण
चक्र
प्रारम्भ
हो जातै
है। यह
समस्त
विकास
पर
प्रतिकूल
प्रभाव
डालता
है।
इन
दुष्परिणामों
को
देखते
हुए
परिवार
नियोजन
संबंधी
सेवाएं
इस
प्रकार
से
उपलब्ध
कराना
आवश्यक
हो जाता
है कि
पुरूष
और
महिलाएं
उनका
सुगमता
से
उपयोग
कर
सकें।
अंतर्राष्ट्रीय
जनसंख्या
विज्ञान
संस्थान
(आई. आई.
पी. एस.)
द्वारा
किए गए
अध्ययन
से यह
पता
चलता है
कि
बिहार,
झारखण्ड,
राजस्थान,
उत्तर
प्रदेश
और कुछ उ.
पू.
राज्यों
जैसे
बहुत स
राज्यों
में
दंपत्ती
संरक्षण
दर 52 से 62
प्रतिशत
तक है।
जब तक नव
युवक-युवतियां
परिवार
नियोजन
की
विधियां
नहीं
अपनाती
और
बच्चों
के जन्म
से
पर्याप्त
अंतर
नहीं
रखती तब
तक
जनसंख्या
वृद्ध
के कारण
देश का
विकास
पिछड़ता
चला
जाएगा।
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