शिशु
मृत्युदर
समस्त
भारत
में
जीवित
पैदा
हुए
प्रति
एक हजार
बच्चो
में से
औसत 58
बच्चे
मौत के
मुंह
में चले
जाते
हैं।
विकसित
देशो
में यह
संख्या 5
से भी कम
है। इस
दिशा
में
राज्यों
के मध्य
काफी
अंतर
है।
जीवित
पैदा
हुए
प्रति 1000
में से
केरल
में
शिशु
मृत्यु
दर 12 है
जबकि
मध्य
प्रदेश
में 79
है।
विकासशील
देशों
में
पैदा
होने
वाले कम
भार
वाले
बच्चों
में से 35
प्रतिशत
अकेले
भारत
में ही
पैदा
होते
हैं।
विकासशील
देशों
में
कुपोषण
का
शिकार
हुए
बच्चों
में से 40
प्रतिशत
बच्चे
अकेले
भारत
में
हैं।

कुल
मौतों
में
से दो
तिहाई
मौतें
जन्म
के
पहले
सप्ताह
में
हो
जाती
हैं
और
इनमें
से दो-
तिहाई
मौतें
जन्म
के
पहले
दो
दिन
के
भीतर
हो
जाती
हैं (भारतीय
चिकित्सा
अनुसंधान
परिषद
आई. सी
एम. आर.)
इस
प्रकार
45
प्रतिशत
नवजात
शिशुओं
की
मृत्यु
उनके
जन्म
से 48
घंटों
के
भीतर
हो
जाती
है। |
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| नवजात
शिशु
की
देखरेख
के
लिए
चुनौतियां |
-
अधिकांश
सम्याएं
प्रसवपूर्ण
अवधि
और
प्रसव
के
दौरान
तथा
जन्म
के
तुरंत
बाद
अपर्याप्त
देखरेख
के
कारण
पैदा
होती
हैं।
-
जन्म
के
समय
कम
भार
होने
के
तथा
कुपोषण
के
कारण
बच्चे
के
पूर्ण
विकास
में
बाधा
उप्पन्न
होती
है।
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बाल
मृत्युदर
शैशव
अवस्था
के
प्रथम
वर्ष के
दौरान
मृत्यु
होने के
कारण है-
जन्म के
समय कम
भार
होना,
कुपोषण,
दस्त
होना और
स्वांस
नली में
तीव्र
संक्रमण
होना।
बाल
मृत्युदर
के कारण
जन्म दर
वृद्ध
होती है
क्योंकि
माता-पिता
मृतक
बच्चे
की
पूर्ति
करने के
लिए और
बच्चे
मृत्यु
हो जाने
की
संभावना
के कारण
और अधिक
बच्चे
पैदा
करते
हैं।
माताएं
बच्चो
को जन्म
देती
हैं
जबकि
उनके
जीवित
रहने की
संभावना
बहुत
कम
संभावना
होती है
क्योंकि
उनका
अपना
स्वास्थ्य
अच्छा
नहीं
होता। जनसंख्या
बन्ध्यीकरण
प्रयास
इस
घृणित
चक्र को
दर्शाते
हैं और
शिशु
मृत्युदर
कम करने
पर
ध्यान
केन्द्रित
करते
हैं।
शिशु
मृत्युदर
को कम
करने के
लिए
टीकाकरण,
सुरक्षित
पेयजल
तक
पहुंच,
सफाई और
महिलाओं
की
साक्षरता
की
संयुक्त
भूमिका
है।
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