होम  -  जनसंख्या के मूल सिद्धांत  -  सरलीकृत जनसंख्या अवधारणा  -  क्या जनसंख्या एक समस्या है?
पर्यवलोकन
जे.एस.के.  के कार्य
जे.एस.के.  किस प्रकार भिन्न है?
जे.एस.के.  की निधि
सदस्यता का पंजीकरण
दान और अंशदान
जिला स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े
  

विश्व की जनसंख्या

भारत की जनसंख्या

जनसंख्या का विषय
 महत्वपूर्ण क्यों है ?
सरलीकृत जनसंख्या की अवधारणा
- पर्यवलोकन
- जनसांख्यिक संक्रमण
- भारत की जनसंख्या
- क्या जनसंख्या एक समस्या है?
- लिंग अनुपात और जनसंख्या
- विकास और जनसंख्या
- गरीबी और जनसंख्या
- लिंग और जनसंख्या
- बाल स्वास्थ्य और जनसंख्या
- गर्भ निरोध और जनसंख्या
- युवा और जनसंख्या
- एच. आई. वी./एड्स एवं जनसंख्या
सरकार के प्रचलित कार्यक्रम
जनसंख्या से संबंधित संपर्क

यौन और जनन स्वास्थ्य पर 
प्राय पूछे जाने वाले प्रश्नः

सीधे उत्तर

क्या जनसंख्या एक समस्या है?

भारत ने जनसांख्यिक संक्रमण के साथ-साथ नीचे लिखे अनुसार प्रगति की हैः 

20 वीं सदी के प्रारम्भ में जन्म दर और मृत्यु दर दोनो अधिक थीं, भारत में 1960 और 1970 के दौरान जनसंख्या विस्फोट हुआ जबकि मृत्यु दर में अचानक कमी आई परन्तु जन्म दर अधिक (उच्च) ही बनी रही। इस अवधि के दौरान, भारत की जनसंख्या जो 1950 में थी उस से दुगुनी हो गई। तब लोगों को इस बात के लिए प्रेरित किया गया कि वे अपने परिवार का आकार घटाएं और प्रति महिला 6 बच्चों के स्थान पर दो बच्चों को ही जन्म दे। उस समय एक लोकप्रिय अभियान जैसे कि "हम दो हमारे दो " चलाया गया जिसका उद्देश्य छोटे परिवार की वांछनीयता पर ध्यान केन्द्रित करना था।

अब हालात बदल गए हैं। प्रति महिला बच्चों की औसतन संख्या कम हो गई है, जिसका तात्पर्य यह है पति पत्नी स्वयं ही छोटा परिवार पसंद कर रहे हैं। इसलिए आज हमें छोटे परिवार को प्रोतसाहित करने वाले संदेश बहुत कम सुनाई पड़ रहे हैं। अब शादी की उम्र बढ़ाकर शिशु मृत्युदर को कम करने और अंतराल या दो निरंतर गर्भों के बीच अंतर रखने के लिए प्रोत्साहित करते हुए गुणवत्ता जनन और बाल स्वास्थ्य की देखरेख के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है। अब यह संदेश स्वास्थ्य कामगारों और गैर- सरकारी संगठनों द्वारा समुदाय स्तर पर पहुंचाया जा रहा है।

यौन और जनन अधिकार
जनन अधिकार वस्तुतः विस्तृत रुप से मान्यता प्राप्त और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानव अधिकारों से प्राप्त होते हैं। परन्तु फिर भी, जनन अधिकारों की अवधारणा अपने आप में अपेक्षाकृत नई है, और उनके महत्व को बहुत से वर्गों में कम समझा जाता है। जनन अधिकार केवल नैतिकता पर ही आधारित नहीं है बल्कि लोगों के जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित करते हैं।

महत्वपूर्ण यौन और जनन अधिकारों के अन्तर्गत कामवासना से संबंधित रूचि तथा जनन संबंधी निर्णय लेना सम्मिलित है, जिसमें शादी की स्वैच्छिक पसंद और बच्चों की संख्या, समय और दो बच्चों के जन्म के बीच अंतर रखने का निर्णय लेना सम्मिलित है जो उनके अन्तर्गत ऐसी सूचना और साधनों को प्राप्त करने का अधिकार सम्मिलित है जो ऐसी स्वैच्छिक रुचि को पूरा करने के लिए आवश्यक है।

इससे दंपत्तियों को यह अधिकार प्राप्त हो जाता है कि वे गर्भनिरोध से संबंधित अवगत रूचियां अपना कर अपने परिवारों की योजना तैयार कर सकते हैं और इस प्रकार एच. आई. वी/एड्स अवांछित गर्भ,धारण करने, मातृत्व अस्वस्थता दर मृत्युदर के प्रभावों को कम किया जा सकता - ये सभी जनसंख्या के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।

जनन अधिकारों के अंतर्गत पुरूषों और महिलाओं के लिए वह क्षमता भी शामिल है जिससे वे जीवन के सभी क्षेत्रों में स्वतंत्र रह सकते हैं और विदित रूचियों को पूरा कर सकते हैं तथा लिंग आधारित भेदभाव से मुक्त रह सकते हैं।

जनन और यौन स्वास्थ्य पुरूषों और महिलाओं दोंनो के लिए समस्त जीवन चक्र के दौरान समग्र स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य अवयवों का निर्माण करते हैं। जीवन चक्र मार्ग को अपनाकर यह अधिकार यौन और जनन स्वास्थ्य को जीवन के सभी स्तरों पर गुणवत्ता जीवन के रूप में प्रोत्साहित करता है और केवल प्रजनन तक ही सीमित नहीं रहता।

जनन अधिकारों की प्रचालन संबंधी समस्याएं:-
जनन अधिकार, जनन बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के माध्यम से प्रचालन में आए।

प्रथमतः कार्यक्रम के अंतर्गत पूर्व नियत लक्ष्य पहुंचों को प्रक्रिया सहित ऊपर से नीचे तक वहां बदल दिया गया जहां सेवा उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति समाज की आवश्यकताओं का आकलन करते हुए लक्ष्यों को नियत करने में सक्रिय रूप से सम्मिलितहैं।

द्वितीयतः सेवा प्रदान करने के लिए लिंग सुग्राही पहुंच को अपनाया गया। महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं को गर्भावस्था और बच्चे के जन्म से परे प्रचलित आवश्यकताओं के रूप में देखा गया। इस प्रकार लड़कियों की स्थिति, किशोर-किशोरियों का स्वास्थ्य, और शिक्षा, पारिवारिक सख्ती, महिलाओं का सशक्तिकरण जैसी समस्याएं कार्यक्रम की अनिवार्य अंग बन गई। बांझपन, जनन मार्ग का सक्रमण और यौन संचालित रोगों सहित सभी प्रकार की सेवाओं को जनन बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत शामिल किया गया। एक ऐसा वातावरण तैयार करने का भी प्रयास किया गया जहां महिलाओं को मित्रवत् सेवा प्रदान की जा सके। परिवार के आकार और मां तथा बच्चे के स्वास्थ्य से संबंधित उत्तरदायी निर्णय लेने में पुरूषों को भी पहलीवार बराबर के भागीदार के रूप में शामिल किया गया।

इसके अतिरिक्त, सूचना अभियानों पर आधारित जनसंचार माध्यम का स्थान परामर्शदात्री सेवा केन्द्रों ने लि लिया जिससे दंपत्ती अपने संबंधी व्यवहार से संबंधित अपनी अवगत रूचियों को पूरा कर सकते हैं।

पंचायतें और जनसंख्या कार्यक्रमः
अब एक दशक से अधिक समय हो चुका है जब स्थानीय स्व शासन संस्थाओं या पंचायत राज संस्थाओं को संविधान में संशोधन करके स्थानीय शासन के सभी मामलों के संबंध में

अधिकार दिए गए थे, तथा पंचायत राज संस्थाओं की कुल सीटों में से एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए भी आरक्षित की गई, जिसके परिणामस्वरूप, लगभग 30 लाख महिलाओं ने चुनाव में भाग लिया जिसमें से 10 लाख महिलाएं चुनी गई जिन्होंने प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया।

जनन बाल स्वास्थ्य कार्यरक्रम के अंतर्गत समाज की आवश्यकताओं का आकलन प्रारम्भ किया गया तथा वहां स्तर पर सेवा प्रदान करने के लक्ष्य निर्धारित किए गए। इस कार्य में पंचायतों को सक्रिय रूप से भाग लेना अपेक्षित हैं जिन्हें कार्यक्रम के निष्पादन का अनुवीक्षण करने का अधिकार दिया गया है।

पंचायतें स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने वाले तंत्रों को प्रभावी ढंग से केवल तभी प्रभावित कर सकती हैं जबकि कार्यक्रम प्रबंधन की दक्षता से अवगत हो। जनसंख्या स्थिरता कोष एक ऐसा संगठन है जो यह कार्य करना चाहता है।

 
New Page 2

 © प्रतिलिपि अधिकार 2007,  जनसंख्या स्थिरता कोष , सर्वाधिकार सुरक्षित