गरीबी
और
जनसंख्या आंकड़ों
से पता
चलता है
कि गरीब
व्यक्तियों
के
परिवार
बड़े
होते
हैं।
समस्त
भारत
में
खेती
करने और
मजदूरी
करने के
लिए
बच्चों
को
अतिरिक्त
हाथों
के रूप
में
देखा
जाता है
जो बडे
होकर
परिवार
की आय
बढ़ाने
में मदद
करते
हैं ऐसे
मामलों
में
बच्चों
पर अधिक
खर्च
नहीं
किया
जाता और
बच्चों
पर उनकी
शिक्षा
और पालन
पोषण पर
अधिक
निवेश
करने की
आवश्यकता
नहीं
होती।
अच्छे
स्वास्थ्य
केन्द्रों
और
गर्भनिरोधक
सेवाओ
तक गरीब
व्यक्ति
की
पहुंच
भी
सीमित
होती है,
उन्हें
समय पर
परामर्श
नहीं
मिल
पाता,
गर्भनिरोधक
उपलब्ध
नहीं
पाते और
उन्हें
अनुवर्ती
देखरेख
की
सुविधा
भी नहीं
मिल
पाती जो
यह
देखने
के लिए
अनिवार्य
है कि
गर्भनिरोधक
का
प्रयोग
लगातार
किया जा
रहा है।
स्वास्थ्य
संबंधी
सेवाएं
उचित
मात्रा
में
उपलब्ध
ने होने
के कारण
बाल
मृत्यु
दर अधिक
रहती
है। और
प्रति
परिवार
अधिक
बच्चों
को उच्च
बाल
मृत्युदर
के लिए
एक बीमा
के रूप
मे देखा
जाता
है।
अधिक
गरीब
परिवारों
मे
बच्चों
को
बुढ़ापे
मे
मददगार
के रूप
मे देखा
जाता है
क्योंकि
बहुत से
परिवार
किसी
संगठित
क्षेत्र
मे
कार्य
नहीं
करते और
बुढ़ापे
में
सामाजिक
सुरक्षा,
बचत,
पेंशन
जैसी
किसी
सुविधा
के लिए
कोई
साधन
नहीं
होता।
इस
प्रकार
विकास
के
संसाधनों
तक
पहुंच
का अभाव
होने के
परिणामस्वरूप
गरीब
व्यक्तियों
के बड़े
हो जाते
हैं।
क्या
बन्ध्यीकरण
लोगों
की पसंद
है?
किसी
भी
प्रकार
की
जबरदस्ती
सिद्धांत
गलत है
और मूल
मानव
मूल्यों
के
प्रतिकूल
है एवं
मानव
अधिकारों
का
उल्लंघन
करती
है। यह
सुझाव
कि
अवपीड़क
बन्ध्यीकरण
एक ऐसी
पसंद है
जो ऐसे
लोगों
के
दिमाग
की उपज
है जो
मनुष्यों
को उनके
अपने
अधिकारों
और
आवश्यकताओं
के साथ
उन्हें
मानवप्राणियों
की
अपेक्षा
एक
लक्ष्य
के रूप
में
देखते
हैं।
इसके
अलावा,
कुछ
भारतीय
राज्यों
के
आंकड़ों
से यह
स्पष्ट
रूप से
पता
चलता है
कि मानव
अधिकारों
और
स्वतंत्रता
के साथ
समझौता
किए
बिना
जननक्षमता
का
प्रतिस्थापन
स्तर
प्राप्त
करना
संभव
है। चीन
और केरल
में
जननक्षमता
ह्रास
की
तुलना
से यह
पता
चलता है
कि केरल
ने कोई
भी
अवपीड़क
नीतियों
को
अपनाए
बिना ही
चीन से
अधिक
लक्ष्य
प्राप्त
कर लिया
है।
वर्ष 1979
में चीन
की कुल
जननक्षमता
दर (टी.
एफ. आर) 2.8
थी जो 1991
मे घटकर
2.0 रह गई
जबकि
वर्ष 1979
में
केरल की
कुल
जननक्षमता
दर 3.0 थी।
जो 1991 में
घटकर 1.8
रह गई।
तमिलनाडू
में भी
इसी
प्रकार
का
ह्रास
हुआ
हैं।
वहां 1979
में कुल
जननक्षमता
दर 3.6 थी
जो 1991 में
2.2 रह गई।
स्वास्थ्य
सेवा
केन्द्रों
तक सुगम
पहुंच
और
महिलाओं
की
शिक्षा
के कारण
केरल
में
जननक्षमता
दर में
कमी हुई,
जबकि
तमिलनाडू
में
जननक्षमता
दर में
कमी
होने का
अत्यधिक
महत्वपूर्ण
कारक
सफल बाल
पोषण
सहायता
कार्रयक्रम
और
गर्भनिरोधक
आवश्यकताओं
की
पूर्ति
में आने
वाली
बाधाओं
ध्यान
केन्द्रित
करना
था।
जननक्षमता
दर को कम
करने
वाले
अत्यधिक
महत्वपूर्ण
कारकों
में से
एक कारक
है
गर्भनिरोध
की
अप्राप्त
आवश्यक
मदों की
पूर्ति
करना।
इस उपाय
से
जननक्षमता
दर लगभग
20
प्रतिशत
कम हो
सकती
है।
बच्चा
जीवित
रहेगा
यह
सुनिश्चित
करने से
बच्चों
के जन्म
में 20
प्रतिशत
की कमी
की जा
सकती
है।
बाल
पोषण के
लक्ष्य
पर अलग
से
विचार
किया
जाना
चाहिए।
विद्यालयों
में 'मध्य
अवकाश
आहार' (मिड-डे-मील)
योजना
लागू
करने से
विद्यालयों
में
विद्यार्थियों
की संख्या
में
वृद्धि
हुई है
तथा
बच्चों
के पोषण
स्तर
में भी
सुधार
हुआ है
एवं
बच्चों
के
जीवित
में
रहने की
स्थिति
सुधार
हुआ है
तथा
बड़े
परिवारों
की
इच्छा
कम हई
है।
प्रोत्साहन
और
गर्भनिरोध
भारत
की
जनसंख्या
कार्यक्रम
अपने
प्रारम्भिक
स्तरों
में
नकदी या
वस्तु
के रूप
में
प्रोत्साहन
देकर
प्रारंभ
किया
गया था।
गर्भनिरोध
का
प्रयोग
करने के
लिए
प्रेरित
करने
वाले
लोगों
को
प्रोत्साहन
दिए गए
थे।
प्रोत्साहन
को
प्रलोभन,
वेतन
हानि के
लिए
क्षतिपूर्ति
और
पुरुस्कार
के रूप
मे
न्यायोचित
ठहराया
गया।
किसी भी
प्रोत्साहन
आधारित
कार्यक्रम
का
संबंध
लक्ष्यों
से होता
है और
इसके
साथ
लक्ष्य-पहुंच
की
समस्त
बुराइयां
और
दुरूपयोग
की
संभावना
जुड़ी
होती
है। बाद
में गलत
परामर्श
और
जबरदस्ती
किए
जाने के
कारण
परिवारों
को
मानसिक
आघात
पहुंचाता
है। उस
समय
स्थिति
और भी
बदतर हो
जाती है
जब सेवा
किया जा
सके।
इससे
झूठे
आंकड़े
तैयार
किए
जाते
हैं तथा
सेवा का
स्तर
गिर
जाता
है।
गर्भनिरोधक
के
प्रयोग
को
प्रोत्साहित
करने के
लिए इस
प्रकार
से
प्रोत्सहन
देना
कोई
अच्छा
उपाय
नहीं
है।
लोगों
को उनकी
अपनी
भलाई के
लिए दो
बच्चों
के जन्म
में
अंतर
रखने और
परिवारों
को
सीमित
करने की
आवश्यकता
के बारे
में
समझाया
जाना
चाहिए।
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