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लिंग अनुपात और जनसंख्या

देश का लिंग अनुपात क्या दर्शाता है?
पुरूष और महिलाओं को जीवित रहने के लिए लगभग समान अवसर प्राप्त है, समाज में पुरूषों और महिलाओं की लगभग समान संख्या होना अनिवार्य है। तथापि, भारत में महिलाओं में, विश्षतः उनकी जनन अवधि के दौरान, उच्च मृत्यु दर होने के कारण पुरूषों की जनसंख्या की अपेक्षा काफी कम है।

भारतीय जनसंख्या में लिंग अनुपात लगातार गिर रहा है। सन् 1901 में प्रति 1000 पुरूषों की पीछे 972 महिलाएं थी, सन्2001 में यह लिंग अनुपात में इस प्रकार गिरावट होना चिंता का विषय है क्योंकि यह समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य और सामाजिक स्तर का प्रभावी सूचक है, जो बाल मृत्युदर जैसे अन्य सूचकों पर प्रत्यक्ष और निकटस्थ संबंध रखता है।

लिंग अनुपात के गणना विभिन्न आयु वर्गों, अत्यधिक महत्वपूर्ण आयु 0-6 वर्ष, के लिए भी की जाती है।

यहां प्रतिकूल लिंगअनुपात यह दर्शाता है कि लड़को की तुलना में लड़कियां कम पैदा की जा रही है और इस प्रकार यह कन्या भ्रूण के प्रति भेदभाव दर्शाता है। यह गर्भधारण करने, गर्भावधि या प्रसव के दौरान हो सकता है। इस प्रतिकूल (0-6) लिंग अनुपात से यह भी पता चलता है कि सामाजिक, सांस्कृतिक कारक जीवित रहने के अवसर निर्धारित कर रहे हैं।

0-6 वर्ष की आयुवर्ग में लिंग अनुपात कम होने के बारे में चिंता क्यों है?

0-6 वर्ष की आयु वर्ग में लिंग अनुपात का गिरना विशेष रूप से चिंचा का विषय है क्योंकि यह इंगित करता है कि जन्म पूर्व लिंग का चयन करने की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है। लिंग का चयन करने वाली प्रक्रियाएं अब सुगता से उपलब्ध है और जन्म पूर्व चयन करने का यह अनैतिक कार्य वर्तमान स्थिति के लिए काफी सीमा तक उत्तरदायी है।

तथ्य यह बताते हैं कि सामाजिक और आर्थिक रूप से विकसित राज्यों में भी 0-6 आयु वर्ग में लिंग अनुपात काफी कम है। अतः ऐसे राज्यों को आत्म विश्लेषण करने की आवश्यकता है। जिन छः राज्यों में लिंग अनुपात में काफी कमी आई है वे राज्य आर्थिक दृष्टि से काफी विकसित हैं। ये राज्य और संघ राज्य क्षेत्र निम्नलिखित हैं- चण्डीगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पंजाब। आज लिंग का पता लगाने के लिए साधन सुगमता से उपलब्ध है, अतः पुत्र प्राप्ति की लालसा बदलने के लिए समाज का हस्तक्षेप किए बिना यदि लघु परिवार बढ़ते हैं तो कन्याओं के जन्म एवं उनके जीवित रहने के लिए संभवतः यह स्थिति एक विध्वंसकारी होगी।

अत्यधिक घनी आबादी वाले 10 देशों का लिंग अनुपातः

विश्व

990

बंग्लादेश

952

ब्राजील

1031

चीन

943

भारत

933

इण्डोनेशिया

1000

जापान

1041

नाइजीरिया

990

पाकिस्तान

952

सोवियत संघ

1136

अमेरिका

1031

स्रोतः- "विश्व की संभावित जनसंख्या/2002 संशोधन"। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या डिवीजन। यहां उदघृत विश्व की संभावित जनसंख्या रिपोर्ट 2002 में भारत का लिंग अनुपात 933 दिखाया गया है। इस तालिका मे उदधृत भारत के आंकड़े नवीनत भारतीय जनगणना के आंकड़े दर्शाते हैं।

0-6 वर्ष के आयुवर्ग का लिंग अनुपात

चण्डीगढ़

845
दिल्ली 868
गुजरात 883
हरियाणा 819
पंजाब 798
भारत 927

स्रोतः भारत की जनगणना 2001

लिंग चयनात्मक गर्भपात रोकने के लिए क्या किया जा रहा है?
भारत में लिंग चयनात्मक गर्भपात अवैध है। प्रसव पूर्व नैदानिक तकनीक (विनियमन और दुरूपयोग निवारण) अधिनियम, 1994 बनाया गया और यह प्रथम जनवरी 1996 से प्रचलन में लाया गया ताकि कन्या भ्रूण हत्या रोकी जा सके। इस अधिनियम के अधीन कुछ नियम भी बनाए गए। भ्रूण के लिंग का निर्धारण करना और बताना इस अधिनियम में निषेध ठहराया गया है। तथा अधिनियम में लिंग का प्रसव निर्धारण करने से संबंधित किसी भी विज्ञापन को निषेध बताया गया है तथा इसका उल्लंघन करने वाले को दंड देने का विधान किया गया है। इस अधिनियम का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को कारावास की सजा भुगतने के साथ उसे जुर्माना भी देना होगा।

गर्भधारण करने से पहले और बाद में लिंग का चयन करने के लिए खोज की गई टेक्नोलॉजी को ध्यान में रखते हुए, अभी हाल में प्रसव पूर्व नैदानिक तकनीक अधिनियम और नियमों को संशोधित किया गया है तथा इस अधिनियम का कार्यान्वित करने में समस्याओं का सामना करना पड़ा। ये संशोधन 14 फरवरी 2003 से प्रभावी हैं।

इस अधिनियम के अंतर्गत, लिंग चयन करने में सहायता लेने वाले व्यक्ति को पहली बार दोष सिद्ध होने पर 3 वर्ष की सजा होगी। तथा उसे 50,000/-रु. जुर्माने के रुप में अदा करने होंगे। लिंग चयन में शामिल चिकित्सा व्यवसायियों का पंजीकरण रद्द किया जा सकता है तथा प्रैक्टिस करने का अधिकार समाप्त हो सकता है, बशर्ते कि इस अधिनियम

के अंतर्गत उनके विरूद्ध दोष सिद्ध हो जाए। तथापि, अधिकारी गण यह मानते हैं कि इस अधिनियम को कार्यान्वित करना एक दुष्कर कार्य है क्योंकि लिंग की जांच डाक्टर और रोगी की गोपनीयता में कमी की जाती है।

कई गैर-सरकारी संगठन जन्म-पूर्व लिंग चयन के विरूद्ध सक्रिय हैं। इस समस्या ने कई स्वास्थ्य अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया है जिन्होंने लिंग चयन करने के साक्ष्य जुटाने के लिए निदानशालोओं और अस्पतालों के अभिलेखों का अनुवीक्षण करना प्रारम्भ कर दिया है ताकि दोषी व्यक्तियों के विरूद्ध कार्रवाई की जा सके।

क्या महिलाओं की संख्या कम होने से उनकी स्थिति मेंबढ़ोतरी हुई है?
नहीं। भारत एक पितृसत्तात्मक समाज रहा है जहां महिलाओं की पीछे रखा जाता है। तथा उन्हें विकास के लाभों से भी वंचित रखा जाता है। गिरता हुआ लिंग अनुपात विद्यमान लिंग प्रवृति का प्रतिबिम्ब है।

कुछ जिलों में लिंग अनुपात कम है, वहां इसका प्रतिकूल प्रभाव सुगमता से देखने को मिलता है क्योंकि बहुत से पुरूषों की शादी भी नहीं हो पाती। वहां बहुपति जैसी प्रथाएं देखने को मिलती हैं, तथा "दुल्हन का मूल्य" और "दुल्हन की बिक्री" जैसी भी प्रथाएं विद्यमान है, जिनके अंतर्गत कीमत लगाकर महिलाओं को "खरीदा"/"बेचा" जाता है इस प्रकार, प्रचलित सामाजिक संदर्भ में, महिलाओं की संख्या और कम होने से उनके विरूद्ध हिंसात्मक कार्रवाई में वृद्धि होगी तथा उन्हें सशक्त करने की अपेक्षा उन्हें अधिकार देने से भी मना कर दिया जाएगा।

पुत्र को वरीयता देने में गलत क्या है?
भारतीय समाज में आर्थिक और परंपरागत दोनों कारणों से ही स्पष्ट रूप से बेटे के लिए वरीयता रही है। परिवार की संपत्ति के लिए एक उचित तथा महत्वपूर्ण उत्तराधिकारी के रूप मे देखने के अलावा वंश को आगे चलाने के लिए पुत्र को एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है, यह भी माना जाता है कि पुत्र अपने मां-बाप की बुढ़ापें में सहायता व सेवा करेंगे। पुत्र को महत्व देने के पीछे एक यह भी मान्यता है कि पुत्र अपने मां-बाप का अंतिम संस्कार (दाह-संस्कार) करके उन्हें मुक्ति दिलाता है।

दहेज रूप सामाजिक बुराई के कारण लड़कियों को एक भार के रूप में देखा जाता है क्योंकि उनकी शादी पर मां-बाप को काफी धन खर्च करना पड़ता है। लड़कियों पर धन खर्च करना धन की बरबादी माना जाता है क्योंकि शादी होने के बाद वे अपने पति के घर चली जाती है और प्रायः अपनी आय में से अपने मां-बाप को कुछ नहीं दे सकती।

जहां ऐसी मान्यताएं विद्यमान हो वहां मां-बाप लड़कियों की अपेक्षा लड़कों पर अधिक निवेश करना उचित समझते हैं चाहे वह निवेश पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा या जीवन बनाने पर किया जाए। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किए जाने वाले ऐसा भेदभाव लड़कियों को प्राप्त विकास के अवसरों को सीमित कर देता है जिससे लिंग प्रवृति को और बल मिलता है।

कम से कम एक पुत्र ही हो ऐसी भावना से ग्रस्त होने कारण महिलाओं पर आश्चर्यजनक मानसिक दबाब पड़ता है, उन्हें लिंग निर्धारण जांच कराने के बाद बार-बार गर्भपात कराने पड़ते हैं। पुत्र के लिए अनुभूत आवश्यकता, वास्तविक मांग पारिवारिक सख्ती के लिए महत्वपूर्ण है तथा उस महिला के लिए भी महत्वपूर्ण है जिस पर लड़का पैदा कर सकने की ^^अयोग्यता^^ का धब्बा लगा दिया जाता है। इसका प्रयोग दूसरा विवाह करने और पत्नी को छोड़ देने के लिए भी बहाने के रूप में किया जाता है। पुत्र की लालसा को वरीयता देना स्पष्टताः गलत है क्योकि इससे लड़कियों का मूल्य घट जाता है और जीवित रहने, वृद्धि और विकास करने के लिए उन्हें उनके बुनियादी अधिकारों से

वंचित कर दिया जाता है। बेट की लालसा की कीमत महिलाओं के जीवन से वसूल की जाती हैं। क्योंकि इससे पुरूष प्रधान समाज की स्थापना होती है तथा निष्पक्ष, न्यायोचित और समान समाज का निर्माण करना कठिन हो जाता है। ऐसी विषम परिस्थिति में महिलाओं को सशक्त बनाने और समाज में उन्हें बराबर का दर्जा देने की दिशा में कोई प्रगति नहीं की जा सकती।

पुत्र के लिए वरीयता जनसंख्या स्थिरीकरण में किस प्रकार बाधक है?
पुत्र के लिए वरीयता जनसंख्या स्थिरीकरण में मुख्य बाधक है, क्यों कि परिवार में कम से कम एक पुत्र होने की अभिलाषा में दंपत्ती बच्चे पैदा करते चले जाते हैं।

पुत्र को वरीयता प्रत्येक राज्य में दी जाती है। तथापि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और अरूणाचल प्रदेशों में इस पर अधिक बल दिया जाता है। इन राज्यों की जनसंख्या वृद्धि दर भी काफी अधिक है। तमिलनाडू, केरल, कर्नाटक और गोआ राज्यों मे पुत्र के लिए कम वरीयता दी जाती है तथा ऐसे राज्य भी हैं जो जनन क्षमता प्रतिस्थापन स्तर प्राप्त कर चुके हैं या प्राप्त करने के निकट हैं। वहां पुरूष-महिला अनुपात भी बेहतर है और महिलाओं का साक्षरता स्तर भी ऊंचा है। पंजाब, हरियाणा और गुजरात जैसे धनाढ्य राज्यों में दंपत्ती छोटे-छोटे परिवार को प्राथमिकता दे रहे हैं परन्तु पुत्र की वरीयता के कारण वे जांच द्वारा लिंग चयन करते हैं जिससे लिंग अनुपात दिशा में बढ़ रहा है।

 
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 © प्रतिलिपि अधिकार 2007,  जनसंख्या स्थिरता कोष , सर्वाधिकार सुरक्षित

 

(पिछला अद्यतनीकृतः 15.01.2008)