युवा
और
जनसंख्या
हमें
युवाओं
पर
ध्यान
केन्द्रित
करने की
आवश्यकताओ
क्यों
होती है?
क्या
शादी के
समय जनन
स्वास्थ्य
प्रारम्भ
नहीं
होता?
भविष्य
में
भारत की
जनसंख्या
की
वृद्धि
किस
प्रकार
होगी, यह
बात 15-24
वर्ष की
आयु
वर्ग
वाले
लोगों
सहित 1890
लाख
लोगों
पर
निर्भर
करती
है।
शिक्षा
और
रोजगार
के
अवसरों
के
अलावा,
यौन जनन
स्वास्थ्य
के
संबंध
में
सूचना
और
मार्गदर्शन
देने के
लिए
उनकी
आवश्यकताओं
को पूरा
करना,
जनसंख्या
और
विकास
कार्यक्रमों
का एक
महत्वपूर्ण
पहलू
है।
किशोर
यौन और
जनन
स्वास्थ्य
कार्यक्रम
उन्हें
उत्तरदायी
और
ज्ञात
निर्णय
लेने
योग्य
बनाते
हैं।
यह
विशेषतः
उन युवा
महिलाओं
के
मामले
में
अधिक
महत्वपूर्ण
है
जिन्हें
ऐसे
अधिकार
दिए
जाने
चाहिए
जिससे
वे अपने
यौन और
जनन
जीवन पर
नियंत्रण
रखने,
अवपीड़न,
पक्षपात
और
हिंसा
से
मुक्त
रहने के
अपने
अधिकार
का
प्रयोग
कर
सकें।
कामुकता
के बारे
में, यौन
संबंध
के बारे
में और
अवांछित
गर्भधारण
करने से
बचने और
यौन
संचारित
रोगों
के बारे
मे
बेहतर
सूचना
प्राप्त
होने से
युवा
लोगों
के जीवन
स्तर
मेंसुधार
आएगा।
किशोर
लड़कियों
और
लड़कों
पर
ध्यान
केन्द्रित
करने के
महत्व
के
समर्थन
में
निम्नलिखित
तथ्य
दिए
जाते
हैः
- भारत
में 15-19
वर्ष
की आयु
वर्ग
वाली
लड़कियों
में स
लगभग 25
प्रतिशत
लड़कियां
19 वर्ष
की आयु
होने
से
पहले
बच्चे
को
जन्म
दे
देती
हैं।
- 18
वर्ष
की आयु
होने
से
पहले
ही
गर्भधारण
करने
से
स्वास्थ्य
के लिए
बहुत
से
जोखिम
पैदा
हो
जाते
हैं। 20-24
वर्ष
की आयु
वाली
महिलाओं
की
अपेक्षा
कम
उम्र
वाली
लड़कियों
की
गर्भावस्था
या
प्रसव
के
दौरान
मृत्यु
होने
की
बहुत
संभावना
होती
है।
- तरुण
माताओं
के
अधिक
बच्चे
होते
हैं
क्योंकि
वे
गर्भनिरोधकों
का
प्रयोग
नहीं
करना
चाहती।
- अन्तर्राष्ट्रीय
योजनाबद्ध
पितृत्व
संघ के
अनुसार
भारत
मे
होने
वाले
गर्भपातों
में से 14
प्रतिशत
तरूण
महिलाएं
कराती
हैं।
- संयुक्त
राष्ट्र
जनसंख्या
कोष (यूं.
एन. एफ.
पी. ए.) के
अनुसार
यदि
पहले
बच्चे
के
जन्म
के लिए
मां की
आयु 18
वर्ष
से 23
वर्ष
तक कर
दी जाए
तो
इससे
जनसंख्या
संवेग
में 40
प्रतिशत
से
अधिक
गिरावट
आसकती
है।
- एच.
आई. वी./एड्स
पर
संयुक्त
राष्ट्र
के
संयुक्त
कार्यक्रम
के
अनुसार
भारत
में एच.
आई. वी.
संक्रमण
से
पीड़ित
लोगों
में से
लगभग
आधे
लोग 25
वर्ष
से कम
आयु
वाले
हैं।
क्या
किशोर -
किशोरियों
को यौन
शिक्षा
देने से
स्वच्छन्द
संभोग
को
बढ़ावा
मिलता
है?
नही,
इस
प्रचलित
विश्वास
के
विपरीत
यौन
शिक्षा
स्वच्छन्द
संभोग
को
बढ़ावा
नहीं
देती
वस्तुतः
ऐसे
कार्यक्रम
असुरक्षित
यौन
संबंध
से
जुड़ी
चिंताओं
को दूर
करते
हैं और
सुरक्षित
यौन
संबंधों
को
प्रोत्साहि
करते
हैं।
यौन
शिक्षा
कार्यक्रमों
पर लिखे
गए 1050
वैज्ञानिक
लेखों
का
विश्व
स्वास्थ्य
संगठन
द्वारा
की गई
समीक्षा
में
अनुसंधान
कर्ताओं
ने यह
देखा कि
"इस
विवाद
का कहीं
कोई
समर्थन
नहीं
किया
गया कि
यौन
शिक्षा
से यौन
अनुभव
प्राप्त
करने के
लिए
प्रोत्साहन
मिलता
है या
क्रियाकलापों
में
वृद्धि
होती
है। यदि
कोई
प्रभाव
नजर आता
है तो वह
अपवाद
से रहित
है
क्योंकि
यह
मैथुन
स्थगित
करने और/या
गर्भनिरोध
का
प्रभावी
प्रयोग
करने की
दिशा
में है।"
रिपोर्ट
में कहा
गया है
कि उचित
और समय
पर
सूचना
उपलब्ध
कराने
में
असफल
रहना- "अनैच्छिक
गर्भ के
अवाछित
परिणामों
और यौन
संचारित
रोगों
के
संचारण
को कम
करने के
अवसर
समाप्त
कराना
है, और
इसलिए
इससे
हमारे
युवाओं
को हानि
होती है"।
किशोर
जनन और
स्वास्थ्य
कार्यक्रमों
में
माता-पिता
और समाज
को
विश्वास
में
लेना
चाहिए
ताकि एक
ऐसा
वातावरण
तैयार
किया जा
सके
जिससे
किशोर
अपने
विकल्पों
का
प्रयोग
कर
सकें।
एक ऐसी
समाकलित
पहुंच
के अभाव
में इस
गतत भय
के आधार
पर
कार्यक्रम
का
विरोध
किया जा
रहा है
इससे
स्वच्छन्द
संभोग
को
बढ़ावा
मिलेगा।
लड़के
और
लड़कियों
दोनों
को एक
साथ
लेकर
कार्य
करने की
आवश्यकता
है ताकि
वे
लड़के-लड़कियां
यौन और
जननप्रक्रियाओं
के
महत्व
को न समझ
सकें।
यह यौन
अधिकारों
की उचित
जानकारी
देता है
और उनका
उचित
उपयोग
करना भी
बताता
है।
अधिक
उम्र
में
शादी
करने से
जनसंख्या
स्थिरीकरण
पर किस
प्रकार
से
प्रभाव
पड़ता
है?
शादी,
भारतवर्ष
मेंलगभग
सार्वभौमिक
है।
शादी के
समय की
आयु का
सीधा
संबंध
महिलाओं
को
उपलब्ध
शिक्षा
और
रोजगार
के
अवसरों
से होता
है।
अशिक्षित
और/या
बोरोजगार
महिलाओं
की
अपेक्षा
बेहतर
शिक्षा
प्राप्त
रोजगार
में
नियुक्त
महिलाएं
देर से
शादी
करती
हैं।
शादी
के समय
न्यूनतम
आयु 1960 के
दशक में
17 वर्ष
थी। जो
1990 के दशक
में
बढ़ाकर
20 वर्ष
कर दी गई
है। फिर
भी, लगभग
43
प्रतिशत
लड़कियों
की शादी
18 वर्ष
की आयु
होने से
पहले ही
कर दी
जाती है
जो कि
महिलाओं
के लिए
भारत
में
शादी की
वैध आयु
है। कम
आयु में
शादी
करने के
अन्य
कारणों
में से
एक कारण
यह भी है
कि
लड़की
अपना
कौमार्य
नष्ट कर
सकती है
जिसके
संरक्षण
के लिए
परिवार
को
उत्तरदायी
माना
जाता है
और शादी
करके इस
उत्तरदायित्व
का
निर्वाह
कर दिया
गया है,
ऐसा
माना
जाता
है।
प्रायः
जल्दी
शादी
होने से
गर्भ भी
जल्दी
रह जाता
है, जैसा
कि
अधिकांश
महिलाएं
शादी के
बाद
शीघ्र
ही
गर्भवती
हो जाती
हैं
क्योंकि
उन्हें
गर्भनिरोधक
सेवाओं
की
जानकारी
और
पहुंच
का अभाव
होता है
तथा
शादी के
प्रथम
वर्ष के
भीतर ही
एक
उत्तराधिकारी
देने के
लिए उन
पर
परिवार
का दबाव
होता
है।
दूसरी
तरफ,
बच्चा
पैदा
करके
अपना "पौरूष"
सिद्ध
करने की
इच्छा
शादी के
तुरंत
बाद
गर्भनिरोधक
विधियों
का
प्रयोग
करने से
रोकती
है।
बच्चे
को जन्म
देना
शादी की
सुरक्षा
के रूप
मे देखा
जाता है
क्योंकि
जब उसकी
पत्नी
उसके
बच्चे
की मां
होती है
तब अपनी
पत्नी
का
उत्तरदायित्व
संभालने
का भार
उस पर और
बढ़
जाता
है। जब
किसी
महिला
के
बच्चे
पैदा
नहीं
होते तो
पति-पत्नी
के
संबंधों
का
विच्छेद
होना और
पत्नी
को छोड़
देने के
मामले
बहुत ही
सामान्य
हो गए
हैं।
किशोर
अवस्था
में
शादी के
तुरंत
बाद या
अन्यथा
गर्भ रह
जाने से
तो मां
और
बच्चे
के
स्वास्थ्य
और जीवन
के लिए
खतरा
बढ़
जाता
है।
बच्चों
की
मृत्यु
हो जाने
पर
दंपत्ती
और
बच्चे
पैदा
करना
चाहते
हैं।
इस
वृहत
स्तर पर
जल्दी
शादी
करने और
जल्दी
बच्चा
पैदा
करने के
परिणाम
स्वरूप
पीढियां
तेजी से
बदलती
हैं,
जनसंख्या
स्थिरीकरण
में
बाधा
उत्पन्न
होती है,
चाहे
दंपत्ती
एक या दो
बच्चे
पैदा ही
क्यों न
करें।
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